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Russia और Iran के नज़दीकी से अमेरिका परेशान

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Russia and Iran strategic cooperation\

Russia और Iran के बीच बढ़ते संबंधों की चर्चा आज के समय में एक महत्वपूर्ण विषय बन गई है। दोनों देशों को पश्चिमी जगत, विशेषकर अमेरिका और यूरोप से विरोध और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है, जिसके कारण उन्होंने एक-दूसरे के करीब आने की दिशा में कदम बढ़ाये हैं। इतिहास में रूस और ईरान के संबंध काफी जटिल रहे हैं, लेकिन हाल के दिनों में दोनों देशों ने अपने रिश्तों को सुधारने की दिशा में काम किया है।

रूस ने ईरान के साथ संबंध मजबूत करने की पूरी कवायद की है। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद लगे प्रतिबंधों के कारण रूस की अर्थव्यवस्था और रक्षा क्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, और इसी कारण रूस ने ईरान के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने की दिशा में काम किया है। ईरान ने भी रूस को अपने ड्रोन और अन्य हथियारों की आपूर्ति की है, जिससे रूस को यूक्रेन युद्ध में मदद मिली है।

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दोनों देशों की इस साझेदारी का उद्देश्य न केवल अपनी अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करना है, बल्कि अमेरिकी वर्चस्व को भी चुनौती देना है। रूस और ईरान दोनों ही अमेरिका सहित यूरोप को यह दिखाना चाहते हैं कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग नहीं पड़े हैं और उनके पास दुनिया के देशों का साथ है। इसके अलावा, दोनों देश अमेरिकी डॉलर को बाजार से बाहर करने के लिए भी सहमत हुए हैं। 

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इस प्रकार, Russia और Iran का साथ आना उनकी साझा चुनौतियों और लक्ष्यों का परिणाम है। दोनों देश तमाम प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं और उनकी अर्थव्यवस्थाओं पर प्रतिबंधों का असर पड़ रहा है, इसलिए उनका साथ आना स्वाभाविक है। हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि यह साथ कहां तक जाएगा और इसके क्या परिणाम होंगे। इस तरह के गठबंधन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए समीकरण बना सकते हैं और वैश्विक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।

ईरान और रूस के संबंधों का अमेरिका पर प्रभाव और इसमें भारत की भूमिका

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Russia और Iran के बीच बढ़ते संबंध अमेरिका के लिए चिंता का विषय हैं, क्योंकि यह उसकी वैश्विक रणनीति और प्रभाव को प्रभावित कर सकता है। जब दो महत्वपूर्ण देश, जिन्हें अमेरिका अपना प्रतिद्वंद्वी मानता है, एक साथ आते हैं, तो यह अमेरिकी विदेश नीति के लिए एक नई चुनौती पैदा करता है। इससे अमेरिका को अपनी नीतियों में बदलाव करने और नए सामरिक गठबंधन बनाने की जरूरत पड़ सकती है। दूसरी ओर, भारत की भूमिका इस संदर्भ में बहुत ही संतुलित और सूक्ष्म है। भारत ने हमेशा एक स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया है और अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लिया है। भारत रूस के साथ अपने ऐतिहासिक और रक्षा संबंधों को महत्व देता है, वहीं ईरान के साथ उसके ऊर्जा संबंध और क्षेत्रीय सहयोग भी महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा, भारत अमेरिका के साथ भी एक मजबूत सामरिक साझेदारी बनाए रखना चाहता है। इसलिए, भारत की कोशिश रहती है कि वह इन सभी देशों के साथ एक संतुलित और सार्थक संबंध बनाए रखे।

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डॉलर को बदलने का विश्व के लिए लाभ और अमेरिका के लिए नुकसान

विश्व व्यापार में डॉलर का विकल्प ढूंढना अन्य देशों के लिए वित्तीय स्वतंत्रता की दिशा में एक कदम हो सकता है। जब देश अमेरिकी डॉलर के बजाय अपनी मुद्रा या अन्य वैश्विक मुद्राओं में लेनदेन करते हैं, तो उन्हें डॉलर की उतार-चढ़ाव वाली विनिमय दरों और अमेरिकी नीतियों के प्रभाव से एक हद तक मुक्ति मिलती है। इससे वे अपनी आर्थिक नीतियों में अधिक स्वतंत्रता और लचीलापन ला सकते हैं। विश्व बाजार में डॉलर के विकल्प का उपयोग वैश्विक वित्तीय प्रणाली में विविधता लाता है और एकाधिकार को तोड़ता है, जिससे सभी देशों को अधिक स्थिरता और सुरक्षा मिल सकती है। हालांकि, अमेरिका के लिए, डॉलर का विकल्प खोजना नुकसानदेह हो सकता है क्योंकि डॉलर की वैश्विक मांग में कमी से उसकी अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। डॉलर की वैश्विक मांग अमेरिका को अपने बड़े बजट घाटे को वित्तपोषित करने और विश्व बाजार में अपनी मुद्रा की मजबूती बनाए रखने में मदद करती है। इसलिए, डॉलर के विकल्प की खोज वैश्विक वित्तीय संतुलन को बदल सकती है और अमेरिका के लिए आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियां पैदा कर सकती है।

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“वसुधैव कुटुम्बकम्।”

अर्थ –“सारा विश्व एक परिवार है।”यह श्लोक ‘Russia और Iran के बढ़ते संबंध’ लेख के संदर्भ में विश्व की एकता और सामूहिकता के महत्व को दर्शाता है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का अर्थ है कि पूरी दुनिया एक परिवार की तरह है, और इसलिए सभी देशों को एक-दूसरे के साथ सहयोग और समझदारी के साथ व्यवहार करना चाहिए। रूस और ईरान के बीच बढ़ते संबंध इस बात का प्रतीक हैं कि जब देश एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हैं, तो वे न केवल अपनी स्थिति मजबूत कर सकते हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर शांति और स्थिरता को भी बढ़ावा दे सकते हैं। इस श्लोक के माध्यम से, हमें यह सीखने को मिलता है कि सभी देशों को विश्व के कल्याण के लिए मिलकर काम करना चाहिए और एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना रखनी चाहिए।

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