भारतीय स्कूलों में smartphones का उपयोग एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है, जिससे न केवल छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है बल्कि उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है। smartphones की वजह से बच्चों का ध्यान पढ़ाई से हट रहा है और वे सोशल मीडिया की लत (addiction) में फंसते जा रहे हैं। यह एक ऐसी समस्या बन चुकी है जिस पर स्कूल प्रशासन, माता-पिता और सरकार को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। हाल ही में इस मुद्दे पर एक वेब सीरीज “Adolescence” आई है, जो स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभावों को उजागर करती है। यह दर्शाती है कि कैसे एक किशोर सोशल मीडिया के प्रभाव में आकर गलत निर्णय लेता है, जिससे उसका जीवन पूरी तरह बर्बाद हो जाता है। इसी तरह, भारतीय स्कूलों में भी स्मार्टफोन का दुरुपयोग (misuse) बढ़ता जा रहा है, जिससे स्कूलों में अनुशासन (discipline) का स्तर गिर रहा है और छात्रों की एकाग्रता (concentration) पर गहरा असर पड़ रहा है।
आजकल छोटे बच्चे भी smartphone की गिरफ्त में आ चुके हैं। कई माता-पिता यह सोचते हैं कि अगर बच्चा मोबाइल में व्यस्त है तो वह शांति से रहेगा और परेशान नहीं करेगा, लेकिन वे यह नहीं समझते कि इससे उनके बच्चे की मानसिक और सामाजिक क्षमता (social skills) प्रभावित हो रही है। पहले बच्चे बाहर खेलते थे, क्रिकेट, फुटबॉल और अन्य खेलों में रुचि लेते थे, लेकिन अब वे दिनभर फोन में लगे रहते हैं। यहां तक कि अगर उन्हें खेलने के लिए बुलाया जाए तो भी वे स्मार्टफोन को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते। डिजिटल कनेक्टिविटी (connectivity) ने बच्चों को सुविधाएं तो दी हैं, लेकिन इसके नुकसान भी उतने ही बड़े हैं। स्मार्टफोन का अत्यधिक उपयोग (excessive use) छात्रों की एकाग्रता को कम कर रहा है, उनकी नींद पर असर डाल रहा है और यहां तक कि उनकी शारीरिक सेहत को भी नुकसान पहुंचा रहा है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई थी। मार्च 2025 में एक याचिका दायर की गई थी जिसमें स्कूलों में स्मार्टफोन पर नियंत्रण लगाने की मांग की गई थी। स्कूलों में अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का गलत उपयोग किया जा रहा है, जैसे कि छात्र क्लासरूम में पढ़ाई करने के बजाय रील्स (reels) बना रहे हैं, वीडियो रिकॉर्ड कर रहे हैं और साइबर बुलिंग (cyberbullying) को बढ़ावा दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर मजाक उड़ाने और अपमानजनक (insulting) टिप्पणियां करने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। कई छात्रों को सोशल मीडिया पर अपमानित (humiliate) किए जाने की वजह से चिंता (anxiety) और अवसाद (depression) जैसी समस्याएं हो रही हैं।
भारत में स्मार्टफोन पर पूरी तरह से प्रतिबंध (ban) लगाना संभव नहीं है क्योंकि यह न केवल मनोरंजन (entertainment) का साधन है, बल्कि पढ़ाई के लिए भी उपयोगी है। ऑनलाइन क्लासेस और डिजिटल लर्निंग (digital learning) की वजह से कई छात्र स्मार्टफोन के माध्यम से ही पढ़ाई कर पा रहे हैं। भारत के ग्रामीण इलाकों में भी स्मार्टफोन की पहुंच बढ़ रही है और इंटरनेट की उपलब्धता (availability) ने छात्रों को ज्ञान प्राप्त करने के नए अवसर दिए हैं। लेकिन स्मार्टफोन का असीमित उपयोग (unlimited use) छात्रों को आलसी और मानसिक रूप से कमजोर बना रहा है। स्क्रीन टाइम (screen time) बढ़ने से बच्चों की आंखों पर असर पड़ रहा है और उनकी शारीरिक गतिविधियां (physical activities) कम हो रही हैं, जिससे वे मोटापे (obesity) जैसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं।
अन्य देशों में भी इस समस्या को गंभीरता से लिया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया ने “ऑफ एंड अवे” (off and away) पॉलिसी लागू की है, जिसके तहत स्कूल में स्मार्टफोन को पूरी तरह बंद रखना अनिवार्य है। इंग्लैंड और कनाडा जैसे देशों में भी स्मार्टफोन के उपयोग पर कड़े नियम बनाए गए हैं। न्यूयॉर्क सिटी ने एक समय पूरी तरह से स्कूलों में स्मार्टफोन पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन माता-पिता के विरोध के बाद यह फैसला वापस लेना पड़ा। अमेरिका, इंग्लैंड और कनाडा जैसे विकसित देशों में भी स्मार्टफोन के दुष्प्रभावों को देखते हुए इस पर नियंत्रण लगाने के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं।
भारत के लिए सबसे अच्छा समाधान (solution) यह होगा कि स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग के लिए एक संतुलित नीति (balanced policy) बनाई जाए। हाल ही में जारी किए गए नए दिशानिर्देशों (guidelines) के अनुसार, छात्र स्कूल में स्मार्टफोन ला सकते हैं, लेकिन उन्हें स्कूल में प्रवेश करने के बाद इसे जमा कराना होगा और स्कूल खत्म होने के बाद वापस लेना होगा। स्मार्टफोन का उपयोग केवल पढ़ाई के उद्देश्य से किया जा सकता है, लेकिन मनोरंजन या सोशल मीडिया के लिए नहीं। क्लासरूम में वीडियो रिकॉर्डिंग, फोटोग्राफी या अन्य गैर-शैक्षणिक (non-educational) गतिविधियों के लिए स्मार्टफोन का उपयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके अलावा, साइबर बुलिंग को रोकने के लिए स्कूल प्रशासन को छात्रों के स्मार्टफोन उपयोग पर नजर रखने की सलाह दी गई है।
स्मार्टफोन के कारण छात्रों में कई मानसिक और शारीरिक समस्याएं बढ़ रही हैं। डॉक्टरों के अनुसार, स्मार्टफोन के अत्यधिक उपयोग से आंखों की समस्याएं, पीठ दर्द, गर्दन की समस्या (neck pain), स्लिप डिस्क (slip disc) जैसी बीमारियां हो रही हैं। डॉक्टर विशाल के अनुसार, आजकल 10 साल के बच्चों में भी स्पॉन्डिलाइटिस (spondylitis) और अन्य रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याएं देखने को मिल रही हैं, जो पहले केवल 30-40 साल की उम्र में होती थीं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ (mental health experts) बताते हैं कि बच्चों में चिंता, अवसाद और आत्मविश्वास (self-confidence) की कमी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिसका कारण स्मार्टफोन की लत है। छोटे बच्चे भी कार्टून और अन्य वीडियो देखने में इतने लीन हो जाते हैं कि वे वास्तविक दुनिया से कट जाते हैं।
अगर स्कूलों में स्मार्टफोन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना संभव नहीं है, तो स्कूलों को सख्त नियम बनाने होंगे। कई स्कूल अब “फोन फ्री पॉलिसी” (phone-free policy) लागू कर रहे हैं, जिससे छात्रों को स्मार्टफोन के दुष्प्रभावों से बचाया जा सके। इसके अलावा, डिजिटल साक्षरता (digital literacy) कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि छात्रों को यह सिखाया जा सके कि स्मार्टफोन का सही उपयोग कैसे करें और इसके नकारात्मक प्रभावों से कैसे बचा जाए। स्कूलों को शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे बच्चों का ध्यान स्मार्टफोन से हटे और वे वास्तविक दुनिया में अधिक सक्रिय (active) बनें।
भारतीय स्कूलों में स्मार्टफोन एक बड़ी चुनौती बन चुका है और इसे हल करने के लिए स्कूल प्रशासन, माता-पिता और सरकार को मिलकर काम करना होगा। अगर सही दिशा में कदम उठाए गए तो यह समस्या हल हो सकती है, लेकिन अगर इसे नजरअंदाज (ignore) किया गया तो आने वाले समय में यह और भी गंभीर हो सकती है। स्मार्टफोन का उपयोग पूरी तरह से बंद करना संभव नहीं है, लेकिन इसे नियंत्रित (control) करना बेहद जरूरी है ताकि बच्चों का भविष्य सुरक्षित और उज्ज्वल (bright) बना रहे।