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The Dark Secrets of Kamrup Tantra! |
बलि प्रथा और शक्ति उपासना का संबंध प्राचीन काल से चला आ रहा है, विशेषकर कामरूप क्षेत्र में, जिसे शक्ति साधना का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। इस क्षेत्र की धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं में बलि का महत्वपूर्ण स्थान रहा है, जिसे कालिका पुराण और योगिनी तंत्र जैसे ग्रंथों में विस्तार से समझाया गया है। शक्ति उपासना में बलि को अनिवार्य रूप से देखा जाता है, हालांकि आधुनिक समय में इसके स्वरूप में परिवर्तन आया है। इस विषय पर चर्चा करना एक संवेदनशील मुद्दा है, लेकिन इसकी ऐतिहासिक और धार्मिक प्रासंगिकता को समझना आवश्यक है।
कालिका पुराण के अनुसार, बलि आठ प्रकार की होती थी, जिसे अष्ट बलि कहा जाता है। इसमें पक्षी, कछुआ, मगरमच्छ, विभिन्न प्रकार के मृग, सिंह, मछली, हाथी और साधक के स्वयं के रक्त की बलि सम्मिलित थी। इनमें से कुछ प्रकार की बलि अब विलुप्त हो चुकी हैं, लेकिन कुछ आज भी शक्ति उपासना के अनुष्ठानों में देखी जाती हैं। कामरूप क्षेत्र में, विशेष रूप से मां कामाख्या मंदिर में, बलि प्रथा एक पारंपरिक अनुष्ठान के रूप में प्रचलित है। यहां तक कि साधकों को दीक्षा के समय भी मां कामाख्या के बाम मार्ग में प्रवेश करने के लिए विशेष अनुष्ठानों का पालन करना पड़ता है, जिसमें बलि की स्वीकृति भी शामिल होती है।
योगिनी तंत्र के अनुसार, हर क्षेत्र की अपनी पूजा पद्धति होती है, और शक्ति उपासना के कुछ विशेष मार्ग, जैसे वाम मार्ग और कोल मार्ग, में बलि का विधान अनिवार्य माना गया है। कालिका पुराण में इस बात का भी उल्लेख है कि बलि के समय कुछ विशिष्ट मंत्रों का उच्चारण करना आवश्यक होता है। इनमें “ओम ऐंग हरिंग श्रंग” जैसे मंत्रों का प्रयोग किया जाता है, जो बलि को देवी को अर्पित करने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। साधक को यह मानते हुए बलि देनी होती है कि यह यज्ञ का ही एक स्वरूप है और इसे हिंसा की श्रेणी में नहीं रखा जाता।
बलि विधान के अंतर्गत, खड़क (तलवार) की पूजा की जाती है, जिसे देवी चंडिका का प्रतीक माना जाता है। इस खड़क को विशेष रूप से अभिषिक्त किया जाता है और इसे शक्ति का स्वरूप मानकर बलि प्रदान की जाती है। बलिदान के बाद, प्राप्त रक्त को विशेष विधियों द्वारा देवी को समर्पित किया जाता है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, देवी शक्ति को रुधिर (रक्त) प्रिया और बलि प्रिया कहा गया है, और इसे उनकी साधना के लिए आवश्यक तत्व माना जाता है।
हालांकि, आधुनिक समय में बलि प्रथा को लेकर मतभेद भी देखने को मिलते हैं। कई स्थानों पर इसे निषेध कर दिया गया है, और लोगों की धार्मिक संवेदनाएं भी इसके प्रति विभाजित हैं। कुछ लोग इसे पुरानी परंपरा मानते हैं, जबकि कुछ इसे क्रूरता के रूप में देखते हैं। लेकिन कालिका पुराण और अन्य तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, बलि का उद्देश्य केवल बलिदान नहीं बल्कि साधक की आध्यात्मिक उन्नति भी होता है। शक्ति की साधना में बलि को एक माध्यम के रूप में देखा जाता है, जिससे साधक देवी की कृपा प्राप्त कर सके और अपने साधना पथ में आगे बढ़ सके।
कामरूप क्षेत्र, विशेष रूप से मां कामाख्या मंदिर, शक्ति उपासना का एक प्रमुख केंद्र रहा है, जहां साधक वर्षों से इस परंपरा का पालन करते आए हैं। यहां पर किसी भी साधना को करने के लिए विशेष दीक्षा की आवश्यकता होती है, और इस दीक्षा प्रक्रिया में बलि का एक महत्वपूर्ण स्थान होता है। हालांकि, बलि देने का अर्थ केवल पशु बलिदान नहीं होता, बल्कि इसमें सब्जियों, फूलों और अन्य प्राकृतिक पदार्थों की बलि भी दी जाती है। यह इस बात को दर्शाता है कि बलि का वास्तविक अर्थ केवल शारीरिक बलिदान नहीं, बल्कि किसी भी प्रकार की आहुति देना है, जो साधक की भक्ति और समर्पण को व्यक्त करता है।
शक्ति उपासना में बलि प्रथा का उल्लेख योगिनी तंत्र में भी मिलता है, जहां कहा गया है कि साधना के लिए किसी भी कठोर नियम का पालन आवश्यक नहीं है। साधक को सन्यासी बनने या ब्रह्मचर्य का पालन करने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि वह सामान्य जीवन व्यतीत करते हुए भी शक्ति उपासना कर सकता है। यह तांत्रिक साधना की एक अनूठी विशेषता है, जो अन्य परंपराओं से इसे अलग करती है। इस संदर्भ में, बलि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि साधक की आध्यात्मिक उन्नति का एक साधन भी है।
अंत में, बलि प्रथा को केवल बाहरी रूप से देखने के बजाय इसके आध्यात्मिक और तांत्रिक महत्व को समझना आवश्यक है। यह केवल हिंसा नहीं, बल्कि शक्ति उपासना की एक विधि है, जो सदियों से चली आ रही है। हालांकि, समय के साथ इसमें बदलाव आया है, और समाज में इसके विभिन्न पक्षों पर बहस होती रही है। लेकिन शक्ति साधना की परंपरा में, बलि को साधक के समर्पण और आस्था का प्रतीक माना जाता है, जो शक्ति की कृपा प्राप्त करने का एक माध्यम बनता है।