लेखक- पुरुषोत्तम जी शर्मा via NCI
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Gudi Padwa |
गुड़ी पड़वा हिन्दू संस्कृति में विशेष स्थान रखने वाला पर्व है, जिसे मुख्य रूप से महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में कुछ जगह बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व का आयोजन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन किया जाता है, जिसे नववर्ष की शुरुआत माना जाता है। गुड़ी पड़वा का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है—”गुड़ी” का अर्थ विजय पताका (flag) होता है और “पड़वा” का अर्थ चैत्र मास का पहला दिन होता है। इस त्योहार को केवल नववर्ष की शुरुआत के रूप में ही नहीं, बल्कि धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
गुड़ी पड़वा का धार्मिक महत्व अनेक पौराणिक कथाओं से जुड़ा हुआ है। मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी, इसलिए इसे सृष्टि की उत्पत्ति का दिन भी कहा जाता है। इसी दिन से नवसंवत्सर (Hindu New Year) का आरंभ होता है। इसके अलावा, यह त्योहार भगवान राम की विजय से भी जुड़ा हुआ है। जब रावण ने माता सीता का हरण कर लिया था और भगवान राम को इस बात का पता चला, तो वे उनकी खोज में दक्षिण भारत पहुंचे। वहां उनकी मुलाकात सुग्रीव से हुई, जिसने बालि के अत्याचारों से उन्हें अवगत कराया। भगवान राम ने बालि का वध किया और दक्षिण भारत के लोगों को उसके आतंक से मुक्त किया। इसी विजय के प्रतीक के रूप में इस दिन को मनाया जाता है। यही कारण है कि गुड़ी पड़वा के दिन घरों के बाहर विजय पताका फहराने की परंपरा है।
इतिहासकारों के अनुसार, इस पर्व की एक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है। कहा जाता है कि शालिवाहन नामक एक महान योद्धा ने मिट्टी की सेना का निर्माण किया, फिर उसपर जल छिड़क के सेना को जीवित कर दिया और अपने शत्रुओं को परास्त किया था। इस विजय के उपलक्ष्य में ही शालिवाहन शक संवत की शुरुआत हुई थी। महाराष्ट्र में इस पर्व का विशेष महत्व है, क्योंकि यह मराठी नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक भी है। इसी दिन से मराठी पंचांग का पहला महीना, चैत्र, आरंभ होता है, जो नई फसल, नई शुरुआत और खुशहाली का प्रतीक होता है।
गुड़ी पड़वा के दिन घरों की विशेष रूप से सफाई की जाती है और प्रवेश द्वार पर रंगोली बनाई जाती है। दरवाजों पर आम और नीम के पत्तों की तोरण सजाई जाती है, जिससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहे। इस दिन एक विशेष ध्वज जिसे ‘गुड़ी’ कहा जाता है, घर के बाहर लगाया जाता है। इसे बाँस की एक लंबी डंडी पर पीले या लाल रंग के कपड़े से सजाया जाता है, जिस पर नीम के पत्ते, आम के पत्ते, बतासे (sugar candy) की माला और एक उल्टा तांबे या चांदी का कलश रखा जाता है। इस गुड़ी को पूर्व दिशा में स्थापित करना शुभ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यह गुड़ी भगवान राम की विजय का प्रतीक है और इसे लगाने से घर में सुख-समृद्धि आती है।
इस दिन विशेष प्रकार के पकवान भी बनाए जाते हैं। महाराष्ट्र में इस अवसर पर पूरनपोली, श्रीखंड-पूरी, बासुंदी और अन्य पारंपरिक मिठाइयाँ बनाई जाती हैं। गुड़ी पड़वा पर लोग विशेष परिधानों में नजर आते हैं, जहां महिलाएं पारंपरिक नौवारी (Marathi Saree) या पठानी साड़ी पहनती हैं और पुरुष धोती-कुर्ता या कुर्ता-पजामा धारण करते हैं। इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और देवी-देवताओं का आशीर्वाद लिया जाता है।
गुड़ी पड़वा के दिन एक विशेष प्रसाद भी वितरित किया जाता है, जिसमें नीम के पत्ते, गुड़ और इमली का मिश्रण शामिल होता है। मान्यता है कि इसे खाने से शरीर रोगमुक्त रहता है और पूरे वर्ष स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है। इस दिन हनुमानजी की पूजा का भी विशेष महत्व होता है। इसके अलावा, लोग अपने रिश्तेदारों और मित्रों के घर जाकर उन्हें नववर्ष की शुभकामनाएं देते हैं।
गुड़ी पड़वा केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में भी इसे बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। आंध्र प्रदेश में इसे ‘उगादि’ (Ugadi) के नाम से जाना जाता है, जबकि कर्नाटक में इसे ‘युगादि’ (Yugadi) कहा जाता है। इन राज्यों में भी इस दिन नए वर्ष का स्वागत विशेष पकवानों और पूजा-पाठ के साथ किया जाता है।
पूजा के दौरान आवश्यक सामग्रियों में फूल, आम के पत्ते, लाल कपड़ा, नारियल, बतासे की माला, पीतल या तांबे का कलश, हल्दी-कुमकुम, और रंगोली के लिए रंग शामिल होते हैं। पूजा विधि के अनुसार, सबसे पहले घर की साफ-सफाई की जाती है और फिर रंगोली बनाई जाती है। उसके बाद, एक लकड़ी या बाँस की डंडी को साफ करके उस पर लाल या पीले रंग का कपड़ा लपेटा जाता है, फिर उस पर आम और नीम के पत्ते बांधे जाते हैं। इस पर तांबे या चांदी का कलश रखा जाता है और फिर इसे घर के प्रवेश द्वार या छत पर लगाया जाता है। इसके बाद, हनुमानजी की पूजा की जाती है और अंत में घर में बनाए गए मीठे पकवानों का भोग लगाया जाता है।
गुड़ी पड़वा का समापन राम नवमी के दिन होता है, जो भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व की समाप्ति से पहले, गुड़ी को उतारा जाता है और उस पर लगी बतासे की माला को घर के सदस्यों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। यह पर्व केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लोगों को एकजुट करता है और आपसी सौहार्द को बढ़ावा देता है।
समय के साथ, गुड़ी पड़वा का उत्सव आधुनिक रंग भी लेने लगा है। आजकल इस दिन सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है और विभिन्न संस्थाएँ भी इस दिन को खास बनाने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं। हालांकि, इसके पारंपरिक मूल्यों को बनाए रखना आवश्यक है, क्योंकि यह पर्व भारतीय संस्कृति की गहराई और पौराणिक इतिहास को दर्शाता है।
“नवसंवत्सरे प्राप्ते, स्फुरन्ति मंगलार्चनम्।
धर्मो जयति सर्वत्र, विजयाय च पताकया॥”
नवसंवत्सर (हिन्दू नववर्ष) के आगमन पर मंगल आराधना की जाती है। धर्म की सर्वत्र विजय होती है और विजय पताका (गुड़ी) फहराई जाती है। यह श्लोक गुड़ी पड़वा की भावना को प्रकट करता है, जहाँ विजय, नवसंवत्सर की शुरुआत और धार्मिक आस्था का विशेष महत्व है। इस दिन धर्म की जीत और सकारात्मक ऊर्जा का स्वागत किया जाता है।
गुड़ी पड़वा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि नई ऊर्जा, नई उम्मीदों और विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यह दिन यह संदेश देता है कि चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, विजय और नई शुरुआत के अवसर हमेशा मिलते हैं। इस दिन की खासियत यह है कि यह सिर्फ धार्मिक महत्व का नहीं, बल्कि प्रकृति से भी गहराई से जुड़ा हुआ पर्व है। चैत्र माह के आगमन के साथ ही प्रकृति भी नवजीवन धारण करती है, पेड़ों पर नए पत्ते उगने लगते हैं, फूल खिलने लगते हैं और वातावरण में एक नई ताजगी आ जाती है।
इसलिए, यह पर्व केवल परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन की सकारात्मकता और नए आरंभ का प्रतीक भी है। यह हमें अपने अतीत से जुड़ने, अपनी संस्कृति को बनाए रखने और भविष्य की ओर नई ऊर्जा के साथ बढ़ने की प्रेरणा देता है। गुड़ी पड़वा की परंपराएं हमें सिखाती हैं कि हर कठिनाई के बाद एक नई शुरुआत संभव है, और यही इस पर्व का असली सार है।