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Ancient Hindu Rules of Intimacy |
आज की युवा पीढ़ी तेजी से आधुनिक जीवनशैली को अपना रही है, जिसमें रिश्तों और विवाह को लेकर पारंपरिक सोच में बदलाव देखा जा सकता है। खासकर शारीरिक संबंधों को लेकर युवाओं में जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन सही जानकारी के अभाव में वे कई बार उन गलतियों को दोहरा देते हैं, जो उनके दांपत्य जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं। भारतीय संस्कृति और शास्त्रों में शारीरिक संबंधों को केवल आनंद प्राप्ति का साधन नहीं माना गया है, बल्कि इसे पति-पत्नी के बीच प्रेम और रिश्ते को मजबूत करने का एक माध्यम माना गया है। लेकिन यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि इन संबंधों के लिए कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं, जिनका पालन करना हर विवाहित जोड़े के लिए जरूरी होता है। यदि इन नियमों का सही तरीके से पालन किया जाए, तो वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
शास्त्रों के अनुसार, कुछ विशेष तिथियों और दिनों में शारीरिक संबंध बनाना वर्जित माना गया है। अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति, चतुर्थी, अष्टमी और श्राद्ध पक्ष के दौरान ऐसा करना अशुभ होता है। इन दिनों में ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति नकारात्मक होती है, जिससे दांपत्य जीवन में कलह और आर्थिक नुकसान होने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि इन विशेष तिथियों पर पति-पत्नी को संयम रखना चाहिए और शारीरिक संबंधों से दूर रहना चाहिए।
सही समय का चुनाव भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। शास्त्रों में रात के पहले प्रहर यानी रात 12 बजे तक के समय को प्रेम संबंध बनाने के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है। इस समय सकारात्मक ऊर्जा अधिक प्रभावी होती है, जिससे दांपत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है। इसके अलावा, इस समय किए गए संबंधों से उत्पन्न होने वाली संतान भी बुद्धिमान और भाग्यशाली होती है। इसके विपरीत, रात 12 बजे के बाद शारीरिक संबंध बनाने से नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ सकता है, जिससे संतान में नकारात्मक गुण विकसित होने की संभावना रहती है।
शारीरिक संबंधों में स्वच्छता का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार, संभोग से पहले और बाद में स्नान करना आवश्यक होता है, जिससे शरीर और मन दोनों की शुद्धि होती है। यदि किसी व्यक्ति को संक्रमण, घाव या अन्य कोई बीमारी हो, तो उसे शारीरिक संबंधों से बचना चाहिए, ताकि स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से बचा जा सके। स्वच्छता के साथ-साथ कामसूत्र का ज्ञान भी पति-पत्नी के लिए जरूरी होता है। कामसूत्र केवल एक संभोग गाइड नहीं है, बल्कि यह रिश्तों को समझने और उन्हें संतुलित रखने का एक महत्वपूर्ण साधन है। यदि पति-पत्नी इस ज्ञान का सही ढंग से उपयोग करें, तो उनके रिश्ते में स्थिरता बनी रहती है और वे एक-दूसरे के प्रति अधिक वफादार रहते हैं।
महिलाओं के मासिक धर्म (menstruation) के दौरान शारीरिक संबंध बनाना न केवल अशुभ माना गया है, बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक हो सकता है। इस दौरान महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) कमजोर होती है, जिससे किसी भी प्रकार का संक्रमण तेजी से फैल सकता है। आयुर्वेद के अनुसार, मासिक धर्म के समय शरीर में दोषपूर्ण ऊर्जा सक्रिय रहती है, जिससे नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न हो सकते हैं। इसलिए इस दौरान संयम रखना और उचित स्वच्छता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होता है।
शारीरिक संबंध केवल शारीरिक सुख तक सीमित नहीं होते, बल्कि यह एक गहरी भावनात्मक (emotional) प्रक्रिया भी होती है। यदि पति या पत्नी में से किसी एक की संभोग करने की इच्छा नहीं है, तो उसके साथी को उस पर दबाव नहीं बनाना चाहिए। जबरदस्ती किए गए संबंध न केवल रिश्ते को कमजोर करते हैं, बल्कि उनमें तनाव भी पैदा कर सकते हैं। इसलिए पति-पत्नी को एक-दूसरे की मानसिक और भावनात्मक स्थिति को समझते हुए ही शारीरिक संबंध बनाने चाहिए।
शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि किसी भी पवित्र स्थान जैसे मंदिर, श्मशान घाट, तीर्थ स्थल या धार्मिक स्थल के निकट शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए। यह स्थान सकारात्मक ऊर्जा और शांति के प्रतीक होते हैं, जिनका अपमान करने से नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसी प्रकार, व्यक्ति को अपने जीवनसाथी के प्रति वफादार रहना चाहिए और विवाह के बाहर संबंध बनाने से बचना चाहिए। विवाहेतर संबंधों को शास्त्रों में पाप माना गया है, जो न केवल दांपत्य जीवन को नष्ट कर सकते हैं, बल्कि मानसिक और आत्मिक अशांति का कारण भी बन सकते हैं।
गर्भवती महिलाओं के साथ शारीरिक संबंध बनाने को लेकर भी शास्त्रों में कुछ नियम बताए गए हैं। गर्भावस्था के पहले तीन महीनों और आखिरी महीने में संभोग करने से बचना चाहिए, क्योंकि इस दौरान गर्भस्थ शिशु (fetus) अत्यंत संवेदनशील होता है। यदि इस दौरान संभोग किया जाता है, तो संतान के विकलांग (disabled) या किसी गंभीर बीमारी के साथ जन्म लेने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान विशेष सावधानी बरतनी चाहिए और यदि आवश्यक हो, तो चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
व्रत और उपवास के समय भी पति-पत्नी को शारीरिक संबंधों से बचना चाहिए। इन दिनों में आध्यात्मिक साधना (spiritual practice) और आत्मसंयम को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे मानसिक शांति और आत्मिक उन्नति होती है। इसके अलावा, संतान प्राप्ति के लिए भी उचित दिनों का चयन करना आवश्यक होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, संतान उत्पत्ति के लिए सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार और शुक्रवार को किए गए संबंध शुभ माने जाते हैं। इन दिनों में ग्रहों की स्थिति अनुकूल होती है, जिससे स्वस्थ, बुद्धिमान और सौम्य संतान की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत, मंगलवार, शनिवार और रविवार को किए गए संबंध नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।
यह भी समझना आवश्यक है कि भारतीय संस्कृति में संभोग केवल भौतिक सुख तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे आध्यात्मिक और मानसिक उन्नति का माध्यम भी माना गया है। कामसूत्र केवल संभोग की कलाओं को समझाने वाला ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर पहलू को संतुलित रूप से जीने की कला सिखाता है। महर्षि वात्स्यायन द्वारा रचित इस ग्रंथ में न केवल शारीरिक संबंधों के नियम बताए गए हैं, बल्कि जीवन में प्रेम, संतुलन और नैतिकता (ethics) का महत्व भी समझाया गया है। इसलिए हर विवाहित जोड़े को इस ग्रंथ का अध्ययन करना चाहिए, ताकि वे अपने दांपत्य जीवन को सुखद और संतुलित बना सकें।
शास्त्रों में बताए गए ये नियम केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका वैज्ञानिक (scientific) और मनोवैज्ञानिक (psychological) महत्व भी होता है। यदि पति-पत्नी इन नियमों का पालन करें, तो उनका दांपत्य जीवन प्रेम, विश्वास और समृद्धि से भरा रहेगा। आधुनिक समय में जहां रिश्तों में अस्थिरता बढ़ रही है, ऐसे में इन शास्त्रीय नियमों का पालन करने से वैवाहिक जीवन को मजबूत और आनंदमय बनाया जा सकता है।