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North vs South |
भारत में उत्तर और दक्षिण राज्यों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक विभाजन एक लंबे समय से चर्चा का विषय बना हुआ है। हाल ही में, इस मुद्दे ने फिर से तूल पकड़ा है, खासकर डीलिमिटेशन (सीटों के पुनर्वितरण) और वित्तीय संसाधनों के बंटवारे को लेकर। दक्षिणी राज्यों का कहना है कि उन्हें केंद्र सरकार से मिलने वाले संसाधनों में अन्याय का सामना करना पड़ रहा है, जबकि उत्तरी राज्यों को अधिक लाभ मिल रहा है। इस स्थिति को समझने के लिए हमें गहराई से विश्लेषण करना होगा कि यह समस्या आखिर आई कहां से और इसका संभावित समाधान क्या हो सकता है।
डीलिमिटेशन यानी जनसंख्या के आधार पर संसदीय सीटों का पुनर्वितरण भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसे 2002 में स्थगित कर दिया गया था और अब 2026 में इसे लागू किए जाने की संभावना है। जब यह लागू होगा, तो अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक संसदीय सीटें मिलेंगी, जबकि कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। दक्षिणी राज्यों की शिकायत है कि उन्होंने परिवार नियोजन को गंभीरता से अपनाया, जिससे उनकी जनसंख्या वृद्धि दर कम रही, लेकिन अब इसी वजह से उनके संसदीय प्रतिनिधित्व में कमी आएगी। तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे राज्य चिंता जता रहे हैं कि इससे उनका राजनीतिक प्रभाव और संसाधनों का हिस्सा कम हो सकता है।
वित्तीय संसाधनों के मामले में भी असंतुलन देखने को मिलता है। केंद्र सरकार राज्यों को विभिन्न माध्यमों से धन हस्तांतरित करती है, जिनमें वित्त आयोग (Finance Commission), केंद्र प्रायोजित योजनाएँ (Centrally Sponsored Schemes – CSS) और केंद्रीय सार्वजनिक निवेश (Central Public Investment) शामिल हैं। वित्त आयोग के अनुसार, केंद्र सरकार राज्यों से प्राप्त कर राजस्व का 41% उन्हें वापस देती है। पहले यह वितरण 1971 की जनसंख्या के आधार पर किया जाता था, लेकिन अब 2011 की जनसंख्या के आंकड़ों को ध्यान में रखा जाता है। इसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर भारत के राज्यों को अधिक फंड मिल रहा है, जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों को अपेक्षाकृत कम। दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतरीन प्रदर्शन किया, लेकिन अब उसी नीति के कारण उन्हें वित्तीय नुकसान हो रहा है। तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों का मानना है कि उनका कर राजस्व केंद्र में जाता है, लेकिन उन्हें उसका समुचित हिस्सा नहीं मिल रहा।
एक और महत्वपूर्ण मुद्दा केंद्र द्वारा संचालित योजनाओं का है। केंद्र सरकार विभिन्न योजनाओं को राज्यों में लागू करती है, और इनमें से कई योजनाएँ जनसंख्या आधारित फंडिंग प्रणाली पर निर्भर होती हैं। इसका मतलब है कि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक वित्तीय सहायता मिलती है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश और बिहार को केंद्र सरकार से अधिक अनुदान मिलता है, जबकि दक्षिणी राज्यों को तुलनात्मक रूप से कम। यही नहीं, केंद्रीय निवेश जैसे आईआईटी, एम्स, पोर्ट्स और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट भी राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर आवंटित किए जाते हैं, जिससे दक्षिणी राज्यों को और अधिक नुकसान उठाना पड़ता है।
राजनीतिक रूप से भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण है। 1976 में, डीलिमिटेशन को रोक दिया गया था ताकि राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। लेकिन अब जब इसे फिर से लागू किया जाएगा, तो इससे दक्षिण भारतीय राज्यों को नुकसान होगा क्योंकि उनकी जनसंख्या वृद्धि दर कम रही है। बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह डीलिमिटेशन लागू करके राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही है क्योंकि हिंदी पट्टी राज्यों में उसका जनाधार मजबूत है। यदि डीलिमिटेशन के कारण उत्तर भारतीय राज्यों को अधिक सीटें मिलती हैं, तो इससे दक्षिण भारतीय राज्यों का संसद में प्रभाव कम हो सकता है।
इन तमाम चुनौतियों के बीच, कुछ संभावित समाधान भी सुझाए जा सकते हैं। एक सुझाव यह है कि संसदीय सीटों के पुनर्वितरण और वित्तीय संसाधनों के वितरण दोनों के लिए 2011 की जनसंख्या को आधार बनाया जाए और इसे अगले 25 वर्षों के लिए स्थिर रखा जाए। इससे दक्षिण भारतीय राज्यों को कुछ हद तक राहत मिलेगी। इसके अलावा, संसदीय सीटों का पुनर्वितरण एक बार में करने के बजाय इसे धीरे-धीरे किया जाए ताकि सभी राज्यों को समायोजन का समय मिल सके। इससे किसी भी क्षेत्र को अचानक नुकसान नहीं होगा और देश में संतुलन बना रहेगा।
दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता। वे देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, उच्च जीडीपी, बेहतर मानव विकास सूचकांक और आर्थिक स्थिरता के कारण उनकी भूमिका बेहद अहम है। यदि उनकी शिकायतों को अनदेखा किया गया, तो इससे क्षेत्रीय असंतोष बढ़ सकता है और यह भारत की एकता और अखंडता के लिए खतरा बन सकता है। इस मुद्दे को हल करने के लिए केंद्र सरकार को संतुलित नीति अपनानी होगी ताकि कोई भी राज्य खुद को उपेक्षित महसूस न करे।
यह स्पष्ट है कि भारत के आर्थिक और राजनीतिक ताने-बाने में उत्तर-दक्षिण विभाजन एक गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। यदि इसे सही समय पर नहीं सुलझाया गया, तो इससे क्षेत्रीय असंतोष और बढ़ सकता है। केंद्र सरकार और नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे इस समस्या का समाधान निकाले ताकि सभी राज्यों को समान अवसर और संसाधन मिल सकें और भारत की एकता बनी रहे।