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Himalayas in Danger? वजह जानकर चौंक जाएंगे!

NCIvimarsh1 week ago

Himalayas in Danger? 

 पृथ्वी पर ग्लोबल वार्मिंग का असर लगातार बढ़ता जा रहा है और इसका सबसे गहरा प्रभाव हमारे पहाड़ों (mountains) पर पड़ रहा है। पहाड़ों की खूबसूरती, उनका ठंडा मौसम और उनमें बसी प्राकृतिक संपदा अब खतरे में हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लेशियरों (glaciers) के पिघलने की दर इतनी तेज हो गई है कि यह अब अस्थायी नहीं बल्कि अपरिवर्तनीय (irreversible) बदलावों की ओर संकेत कर रही है। यह समस्या सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि पूरे विश्व की है, लेकिन चूंकि हम भारतीय हैं, इसलिए हमें अपने पहाड़ों की चिंता पहले करनी चाहिए। हिमालय सहित दुनिया के अन्य पर्वतीय इलाकों में ग्लोबल वार्मिंग की वजह से गंभीर बदलाव हो रहे हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, और इसके कारण विनाशकारी बाढ़ (floods) और अन्य आपदाओं का खतरा बढ़ गया है। वैज्ञानिकों ने 1975 से लेकर अब तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया है और पाया है कि ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका को छोड़कर अन्य ग्लेशियरों ने करीब 9000 बिलियन टन बर्फ खो दी है। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि अगर इसे समझने के लिए तुलना करें तो यह जर्मनी जैसे विशाल देश पर 25 मीटर मोटी बर्फ की चादर बिछाने के बराबर होगा।

पिछले कुछ वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग का असर अधिक स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। तापमान में वृद्धि के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ (glacial lake outburst floods) की घटनाएं बढ़ रही हैं। हिमालय क्षेत्र में पिछले 10 वर्षों में ऐसे कई हादसे हो चुके हैं, जिनमें उत्तराखंड की त्रासदियां सबसे प्रमुख हैं। शोध बताते हैं कि 2006 से 2016 के बीच वैश्विक स्तर पर बर्फ के द्रव्यमान (mass loss) में 335 बिलियन टन की गिरावट दर्ज की गई है। भारत में भी इस परिवर्तन का असर देखने को मिल रहा है, खासकर हिमालयी राज्यों में, जहां बर्फबारी (snowfall) का पैटर्न बदल रहा है। पहले जो बर्फ दिसंबर-जनवरी में गिरती थी, अब वह फरवरी या मार्च में गिरने लगी है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है।

इसके अलावा, एक और गंभीर समस्या है – परमाफ्रॉस्ट (permafrost) के पिघलने की। परमाफ्रॉस्ट वह भूमि होती है जो कम से कम दो वर्षों तक स्थायी रूप से जमी रहती है। यह बर्फ, मिट्टी और चट्टानों का मिश्रण होता है, और आर्कटिक, अलास्का और हिमालय जैसे ऊंचे पर्वतीय इलाकों में पाया जाता है। जब परमाफ्रॉस्ट पिघलता है, तो इसमें फंसे मीथेन (methane) और अन्य ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में उत्सर्जित होती हैं, जिससे ग्लोबल वार्मिंग की गति और तेज हो जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, अगर यह सिलसिला जारी रहा तो आने वाले दशकों में जलवायु परिवर्तन (climate change) की स्थिति और भी भयावह हो जाएगी। परमाफ्रॉस्ट न केवल ग्लोबल वार्मिंग को तेज करता है, बल्कि यह भूस्खलन (landslides) और चट्टानों के गिरने जैसी आपदाओं को भी जन्म देता है, जिससे पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए खतरा बढ़ जाता है।

एक और गंभीर प्रभाव यह है कि बर्फ पर काले कार्बन (black carbon) और अन्य अशुद्धियों की परत जम रही है। यह प्रक्रिया बर्फ की सतह को गर्म करने का कारण बनती है, जिससे बर्फ और तेजी से पिघलती है। वैज्ञानिक इसे सतही ऊर्जा संतुलन (surface energy balance) के बिगड़ने का कारण मानते हैं। इसके अलावा, डस्ट स्टॉर्म्स (dust storms) और जंगलों में लगने वाली आग (wildfires) भी इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं। जंगलों की आग से निकलने वाले कण (particles) बर्फ पर जमा हो जाते हैं, जिससे बर्फ की सफेदी कम हो जाती है और यह अधिक गर्मी अवशोषित करने लगती है।

स्नो कवर (snow cover) में भी तेजी से गिरावट आ रही है। 1979 से 2022 के बीच, पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ की परत में 7.79% की कमी दर्ज की गई है। इसका सीधा असर नदियों के जल प्रवाह पर पड़ता है, क्योंकि पहाड़ों की बर्फ के पिघलने से ही कई प्रमुख नदियां बनती हैं। अगर बर्फ कम होती रही, तो जल स्रोतों पर निर्भर करोड़ों लोगों को पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 2 बिलियन लोग सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों पर निर्भर हैं। हिमालय को भारतीय उपमहाद्वीप के लिए एक वाटर टावर (water tower) माना जाता है, लेकिन यदि यही ग्लेशियर समाप्त हो जाएंगे, तो पानी की उपलब्धता में भारी संकट पैदा हो जाएगा।

ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों के कारण, कई स्थानों पर मौसम के पैटर्न भी बदल रहे हैं। जहां पहले बारिश होती थी, अब वहां बर्फबारी हो रही है, और जहां पहले बर्फ गिरती थी, वहां अब बारिश होने लगी है। इस असामान्यता का सीधा असर कृषि (agriculture), जल संसाधनों (water resources) और पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) पर पड़ रहा है। बर्फ के जल्दी पिघलने से बाढ़ आने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है।

हिमालय के पहाड़ भारत के लिए केवल एक भौगोलिक संरचना (geographical structure) नहीं हैं, बल्कि यह हमारे देश की जलवायु को संतुलित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि हिमालय न होता, तो भारत एक शुष्क (arid) क्षेत्र में बदल जाता। हिमालय की ऊंचाई और उसकी भौगोलिक स्थिति की वजह से मानसूनी हवाएं भारत में प्रवेश कर पाती हैं और यहां वर्षा होती है। अगर हिमालय में इसी तरह बर्फ पिघलती रही, तो आने वाले वर्षों में इसका असर न केवल भारत बल्कि पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ेगा।

इसलिए अब समय आ गया है कि हम अपने पहाड़ों को बचाने के लिए गंभीर कदम उठाएं। सरकारों को चाहिए कि वे ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए सख्त नीतियां लागू करें, औद्योगिक प्रदूषण (industrial pollution) को कम करें और नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) को बढ़ावा दें। साथ ही, आम नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनना होगा। हमें जंगलों को बचाने, प्लास्टिक का उपयोग कम करने और कार्बन फुटप्रिंट (carbon footprint) को कम करने की दिशा में प्रयास करने होंगे।

अगर हम अभी भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसे भविष्य का सामना करना पड़ेगा जहां न तो हरे-भरे पहाड़ होंगे, न ही बर्फ से ढके ग्लेशियर और न ही शुद्ध जल के स्रोत। हमारे पहाड़ धीरे-धीरे मर रहे हैं, और उन्हें बचाने की जिम्मेदारी हमारी है। वरना वह दिन दूर नहीं जब यह पूरी दुनिया एक गंभीर जलवायु संकट (climate crisis) में फंस जाएगी और तब हमारे पास पछताने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

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