Utpanna Ekadashi 2025 : व्रत करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है!

By NCI
On: November 10, 2025 4:11 PM
By- Pandit Dev Sharma- Ujjain via NCI

Utpanna Ekadashi 2025 : मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है, जो वर्ष 2025 में विशेष रूप से 15 नवंबर को मनाई जाएगी। इस तिथि का भारतीय धार्मिक परंपराओं में खास महत्व है। शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। उत्पन्ना एकादशी के अवसर पर घर में मां लक्ष्मी का वास लंबे समय तक बना रहे, इसके लिए तुलसी से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें और नियमों का पालन करना आवश्यक है। आज के इस लेख में विस्तार से जानते हैं कि उत्पन्ना एकादशी पर तुलसी के किस नियम का पालन करना चाहिए, क्यों यह संयम जरूरी है, व्रत के सही समय, पूरा धार्मिक महत्व और इससे जुड़ी मान्यताएं क्या हैं।

एकादशी व्रत का महत्व

हिंदू धर्म में हर माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि अत्यंत शुभ मानी जाती है। इस दिन उपवास व पूजा करने का विधान शास्त्रों में विस्तार से बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि एकादशी व्रत का पालन करने से व्यक्ति को पूर्व जन्मों तथा इस जन्म में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है, उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और उसे जीवन में खुशहाली और शांति प्राप्त होती है। उत्पन्ना एकादशी खासकर मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है और धार्मिक संदर्भ में इसका काफी महत्व है। यह व्रत सभी साधकों के लिए पुण्य, मोक्ष और सुख-समृद्धि की ओर अग्रसर करता है। इस दिन विधिपूर्वक व्रत और पूजा करने से साधकों का जीवन धन्य हो जाता है और घर में मां लक्ष्मी का स्थाई वास होता है।​

उत्पन्ना एकादशी का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 15 नवंबर 2025 को रात 12:49 AM मिनट पर होगी और यह तिथि अगले दिन यानी 16 नवंबर को रात 02:37 मिनट पर समाप्त होगी। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार एकादशी व्रत सूर्योदय के समय से रखा जाता है, अत: इस वर्ष उत्पन्ना एकादशी 15 नवंबर, 2025 को मनाई जाएगी। जिन श्रद्धालुओं को व्रत रखना है, वे पूर्व संध्या को ही सात्विक भोजन करें, अगले दिन सूर्य उदय के साथ व्रत का संकल्प लें और सम्पूर्ण दिन धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ, जप-ध्यान करते रहें। एकादशी का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है, अर्थात अगले दिन व्रत का विधिपूर्वक समापन करना चाहिए।​

एकादशी और तुलसी: धार्मिक मान्यताएं

एकादशी के दिन तुलसी के पौधे और उसकी पूजा का उल्लेख शास्त्रों में विशेष रूप से मिलता है। तुलसी को हिंदू धर्म में देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी तिथि के दिन तुलसी माता भी स्वयं निर्जला व्रत का पालन करती हैं। ऐसी स्थिति में एकादशी के दिन तुलसी के पौधे में जल अर्पित करना वर्जित है। यदि कोई व्यक्ति इस दिन तुलसी को जल देता है तो उनका व्रत खंडित हो जाता है और उन्हें व्रत का पूर्ण फल नहीं प्राप्त होता। इसी तरह, एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना भी अनुचित है। ऐसी गलती करने से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं, जिससे धन, सुख और समृद्धि में घटाव आता है।​

एकादशी के दिन तुलसी के साथ बरतें ये सावधानियां

इस दिन तुलसी से जुड़ी सावधानी बरतना बेहद आवश्यक है। इसका पालन न करने से शास्त्रों की दृष्टि में व्रत का फल अधूरा रह जाता है और जीवन में नकरात्मकता का प्रवेश हो सकता है।

  • एकादशी तिथि पर किसी भी स्थिति में तुलसी के पौधे में जल अर्पित न करें। यह नियम विशेष रूप से सभी भक्तों के लिए अनिवार्य है।

  • एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना गंभीर भूल माना गया है। इस दिन पत्ते तोड़ने से देवी लक्ष्मी अप्रसन्न हो जाती हैं।

  • तुलसी माता का पौधा गंदगी से दूर रखें, खासकर एकादशी के मौके पर। मां लक्ष्मी का वास साफ-सुथरी जगह पर ही होता है।

  • तुलसी के पौधे को गंदे या जूठे हाथों से छूना अशुद्ध फलकारी होता है, जीवन की सकारात्मकता प्रभावित होती है।

  • पौधे के आस-पास किसी प्रकार की गंदगी न होने दें। तुलसी के पास गंदगी होने से घर में मां लक्ष्मी का वास नहीं होता, जिससे धन की कमी और जीवन में समस्याएं आ सकती हैं।

  • एकादशी के दिन किसी भी तरह से तुलसी के पौधे का अपमान ना करें, ऐसा करने से सभी शुभ फल बाधित हो सकते हैं।​

तुलसी की शुद्धता का महत्व

शास्त्रों के अनुसार तुलसी माता की पूजा एवं देखभाल में शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। हिंदू परंपरा में तुलसी को पवित्रता का प्रतीक माना गया है, जिसके कारण उसकी उपासना और सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। शुद्ध-पवित्र हाथों से ही तुलसी के पौधे का स्पर्श करें। यदि पूजा में तुलसी के पत्तों की आवश्यकता हो तो एकादशी से एक दिन पूर्व ही पत्ते तोड़कर रख लें ताकि व्रत के दिन इस नियम का उल्लंघन न हो। तुलसी के पौधे के समीप हमेशा साफ-सफाई रखें, स्नान करके ही उसके पास जाएं। यदि तुलसी का अपमान होता है, तो मां लक्ष्मी घर छोड़ देती हैं, जिससे गृहस्थ जीवन में तनाव, धन की कमी, स्वास्थ्य समस्याएं और नकरात्मकता आ जाती है।​

मां लक्ष्मी का वास: धार्मिक दृष्टिकोण

मां लक्ष्मी को सुख-समृद्धि, धन एवं शुभता की देवी माना जाता है। उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए घर में पवित्रता और शुद्धता जरूरी है। ऐसी मान्यता है कि मां लक्ष्मी वहां वास करती हैं, जहां तुलसी के पास साफ-सफाई, सकारात्मकता और धर्म का पालन हो रहा हो। एकादशी के राजनीतिक अवसर पर नियमों का पालन करना उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने की विशेष चाबी है। यदि इन नियमों का पालन नहीं किया गया तो परिवार में dhan की कमी, तनाव, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और अन्य विपत्तियां आ सकती हैं।​

एकादशी व्रत विधि

इस दिन सुबह स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें। सबसे पहले भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का ध्यान करें। फिर व्रत का संकल्प लें, “आज मैं एकादशी व्रत का निर्वाह करूंगा/करूंगी और समस्त शास्त्रीय नियमों का पालन करूंगा/करूंगी।” तत्पश्चात विष्णुसहस्रनाम, श्री लक्ष्मी स्तोत्र, श्रीमद्भागवत गीता आदि धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें। पूजा स्थल को साफ-सुथरा रखें, वहीं तुलसी के पौधे को भी सजाएं, लेकिन उसमें जल अर्पित कतई न करें। दिन भर उपवास रखें, सात्विक भोजन ग्रहण न करें, फलाहार या निर्जला व्रत रखा जा सकता है। शाम को दीप प्रज्वलन करें, भगवान विष्णु और तुलसी माता की आरती करें। अगले दिन द्वादशी तिथि को व्रत का पारण करें, यानी उपवास का समापन विधिपूर्वक करें। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र अथवा दान दे सकते हैं।​

उत्पन्ना एकादशी कथा

धार्मिक जनश्रुतियों के अनुसार मार्गशीर्ष माह की एकादशी से जुड़ी कथा भगवान विष्णु और राक्षसों की लड़ाई से संबंधित है। पुराणों के अनुसार एक समय भगवान विष्णु ने मुर नामक राक्षस का वध करने के लिए उत्पन्ना एकादशी की रचना की। इस व्रत के प्रभाव से ही भगवान विष्णु विजयी हुए और तभी से उत्पन्ना एकादशी व्रत का प्रचलन शुरू हुआ। इसी कारण इसे धर्म की रक्षा, पापों की मुक्ति और समस्त कष्टों के निवारण का पर्व माना गया है। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से भक्त भगवान विष्णु तथा मां लक्ष्मी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।​ उत्पन्ना एकादशी का व्रत केवल किसी धार्मिक कर्तव्य का निर्वाह नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म से शुद्धता, पवित्रता और सकारात्मकता की ओर बढ़ने का एक श्रेष्ठ अवसर है। इस दिन तुलसी से जुड़े समस्त नियमों का पालन करना, घर को साफ-सुथरा रखना, श्रद्धा से भगवान विष्णु एवं तुलसी माता की पूजा करना, भक्ति भाव से जप-ध्यान आदि करना गृहस्थों के जीवन में केवल धार्मिक पुण्य ही नहीं, बल्कि मानसिक शांति, स्वास्थ्य, धन, प्रेम और सुख-समृद्धि भी लाता है। मां लक्ष्मी का वास ऐसे घर में स्थायी रूप से बना रहता है जहां धर्म, शुद्धता और सकारात्मकता का पालन हो। एकादशी के दिन हुए पुण्य कर्मों का फल दीर्घकाल तक परिवार को सुख देता है। यदि आपने व्रत का संकल्प लिया है, तो नियमों के अनुसार दिनचर्या का पालन अवश्य करें, क्रोध, लोभ, आलस्य, नकरात्मक विचार और अशुद्धता से बचें। साथ ही तुलसी के संरक्षण और शुद्धता को सर्वोपरि रखें। ऐसा करने से मां लक्ष्मी की कृपा निरंतर बनी रहेगी और जीवन खुशहाल, सुखी और संपन्न रहेगा।

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