Shree Chintaman Ganesh Temple : Ujjain का अनोखा मंदिर!

By NCI
On: January 1, 2026 12:58 PM
लेखक- हरेन्द्र सिंह (गिनीज बुक रिकार्ड धारक) via NCI

Shree Chintaman Ganesh Temple : उज्जैन, जिसे बाबा महाकाल की नगरी और मंदिरों का शहर कहा जाता है, अपनी धार्मिक विरासत के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहाँ के कण-कण में दिव्यता बसी है। वैसे तो उज्जैन आने वाला हर भक्त महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए आता है, लेकिन इस शहर में एक ऐसा चमत्कारी स्थान भी है, जिसके दर्शन के बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है। यह स्थान है ‘श्री चिंतामन गणेश मंदिर’। शहर की भीड़-भाड़ से लगभग 6-7 किलोमीटर दूर यह मंदिर भगवान गणेश का सबसे बड़ा और सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है। ‘चिंतामन’ का अर्थ होता है ‘चिंताओं को हरने वाला’ और ‘मन की मणियों (इच्छाओं) को पूरा करने वाला’। यहाँ का वातावरण इतना शांत और पवित्र है कि मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते ही भक्त को अपनी सारी परेशानियों से मुक्ति मिलती हुई महसूस होती है।

एक साथ विराजते हैं गणपति के तीन अद्भुत रूप

इस मंदिर की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता यहाँ स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमा है। आमतौर पर मंदिरों में गणेश जी की एक ही मूर्ति होती है, लेकिन चिंतामन गणेश मंदिर में एक ही पाषाण (पत्थर) पर भगवान गणेश के तीन रूप एक साथ विराजमान हैं। पहला रूप ‘चिंतामन’ है जो भक्तों की चिंताओं का नाश करता है, दूसरा रूप ‘इच्छामन’ है जो मन की हर इच्छा को पूरा करता है, और तीसरा रूप ‘सिद्धिविनायक’ है जो रिद्धि-सिद्धि और सफलता प्रदान करता है। स्थानीय पुजारियों और पुराणों के अनुसार, यह मूर्ति किसी कलाकार द्वारा नहीं बनाई गई है, बल्कि यह ‘स्वयंभू’ है, यानी यह धरती से स्वयं प्रकट हुई है। भक्त इन तीनों रूपों के दर्शन एक साथ करते हैं, जो अपने आप में एक दुर्लभ संयोग है।

त्रेतायुग और रामायण काल से जुड़ा है इतिहास

इस मंदिर का इतिहास केवल कुछ सौ साल पुराना नहीं, बल्कि त्रेतायुग से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी अपने वनवास के दौरान भ्रमण कर रहे थे, तब वे अवंतिका (उज्जैन) के इस वन क्षेत्र में आए थे। कहा जाता है कि यहाँ माता सीता को भगवान गणेश की पूजा करने की इच्छा हुई, लेकिन वहां कोई मंदिर नहीं था। तब उन्होंने यहाँ विधिवत भगवान गणेश की स्थापना की और उनकी आराधना की। इसीलिए इस सिद्ध पीठ का महत्व बहुत अधिक माना जाता है। आज हम जिस मंदिर की इमारत को देखते हैं, उसका जीर्णोद्धार (Renovation) मराठा शासनकाल में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था, लेकिन मंदिर के खंभे और मूल ढांचा परमार राजाओं के समय (11वीं-12वीं शताब्दी) का है, जो इसकी प्राचीनता का प्रमाण देता है।

लक्ष्मण बावड़ी: जहाँ लक्ष्मण जी के बाण से फूटी थी जलधारा

मंदिर परिसर के अंदर ही एक जल स्रोत है, जिसे ‘लक्ष्मण बावड़ी’ के नाम से जाना जाता है। इसके पीछे एक बहुत ही रोचक और चमत्कारिक कथा प्रचलित है। जब श्री राम, सीता और लक्ष्मण यहाँ वनवास के दौरान रुके थे, तब माता सीता को बहुत जोरों की प्यास लगी। उस समय उस जंगल में आस-पास पानी का कोई स्रोत नहीं था। अपनी भाभी की प्यास बुझाने के लिए लक्ष्मण जी ने अपने धनुष से एक बाण (तीर) धरती पर मारा। बाण लगते ही वहां से पाताल तोड़कर एक जलधारा फूट पड़ा , जिससे माता सीता ने अपनी प्यास बुझाई। तब से यह स्थान ‘लक्ष्मण बावड़ी’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। आज भी भक्त मंदिर में दर्शन करने के बाद इस बावड़ी के दर्शन करते हैं और इसके जल को चरणामृत के रूप में ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि इस जल के आचमन से कई तरह के रोग और दोष दूर हो जाते हैं।

उल्टा स्वास्तिक बनाने की अनोखी परंपरा

चिंतामन गणेश मंदिर देश भर में अपनी मन्नत मांगने की अनोखी परंपरा के लिए भी जाना जाता है। यहाँ भक्त अपनी मनोकामना पूरी करवाने के लिए भगवान के पास ‘उल्टा स्वास्तिक’ बनाते हैं। मंदिर की पिछली दीवार पर भक्त गोबर या सिंदूर से उल्टा स्वास्तिक बनाते हैं और मन्नत मांगते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब उनकी मन्नत पूरी हो जाती है, तो उन्हें दोबारा मंदिर आकर ‘सीधा स्वास्तिक’ बनाना पड़ता है और भगवान को भोग लगाना पड़ता है। इसके अलावा, जिन लोगों की शादी में रुकावट आ रही हो, वे यहाँ ‘रक्षा सूत्र’ (मोली या धागा) चढ़ाते हैं। चैत्र मास के हर बुधवार को यहाँ विशेष मेला (जात्रा) लगता है, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु अपनी अर्जियां लेकर ‘चिंताहरण’ गणेश के दरबार में आते हैं।

Also Read- Sanwaliya Seth Mandir : भगवान खुद बनते हैं यहाँ ‘बिजनेस पार्टनर’!

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now
error: Content is protected !!