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Manipur Crisis: Surrender Weapons or Face Action! |
मणिपुर में हालात एक बार फिर से गंभीर हो चुके हैं और सरकार ने यहां की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए एक आखिरी चेतावनी जारी कर दी है। राज्य में बीते 20 महीनों से हिंसा और तनाव की स्थिति बनी हुई है, जिसकी जड़ें काफी गहरी हैं। मणिपुर की यह स्थिति तब बिगड़नी शुरू हुई जब 20 महीने पहले एक अदालती निर्णय आया, जिसमें मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) का दर्जा देने की बात कही गई थी। इस फैसले के बाद राज्य में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और जातीय संघर्ष भड़क उठा। तब से लेकर अब तक स्थिति पूरी तरह से सामान्य नहीं हो पाई है, बल्कि समय के साथ और भी जटिल होती गई है। हाल ही में मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने इस्तीफा दे दिया, जिससे साफ हो गया कि राजनीतिक अस्थिरता भी अपने चरम पर है। अब केंद्र सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए सख्त कदम उठाने का निर्णय लिया है।
मणिपुर के लोगों को अब सरकार ने अल्टीमेटम दे दिया है कि यदि उनके पास अवैध हथियार हैं, तो उन्हें अगले सात दिनों के भीतर सरेंडर करना होगा। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो सरकार कठोर कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। केंद्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला इस पूरे ऑपरेशन की निगरानी कर रहे हैं, जिन्हें खास तौर पर इस स्थिति को संभालने के लिए जिम्मेदारी दी गई है। मणिपुर के हालात ऐसे हो चुके हैं कि राज्य धीरे-धीरे सरकार के नियंत्रण से बाहर जा रहा था। पुलिस पर हमले हो रहे थे, सुरक्षा चौकियों को निशाना बनाया जा रहा था और आम जनता हिंसा की चपेट में आ चुकी थी। लोगों के घर उजड़ गए थे, हजारों लोग विस्थापित हो चुके थे और राज्य में सामान्य जीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया था।
इस पूरे संघर्ष में मुख्य रूप से दो समुदाय शामिल हैं—मैतेई और कुकी। मैतेई समुदाय जो मुख्य रूप से घाटी क्षेत्रों में रहता है, उसने खुद को इस राज्य का मूल निवासी बताते हुए अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा मांगा। इस मांग के पीछे तर्क दिया गया कि चूंकि वे सदियों से इस भूमि पर रह रहे हैं, इसलिए उन्हें भी इस श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए ताकि सरकारी योजनाओं और नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिल सके। लेकिन कुकी और नागा समुदाय जो मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में बसे हैं, उन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया। उनका मानना है कि मैतेई समुदाय पहले से ही संपन्न और प्रभावशाली है, और यदि उन्हें एसटी का दर्जा मिल जाता है, तो पहाड़ी समुदाय और भी पीछे रह जाएगा। यह विवाद धीरे-धीरे हिंसक संघर्ष में बदल गया, जिसने पूरे मणिपुर को अपनी चपेट में ले लिया।
इस संघर्ष के कारण राज्य में लॉ एंड ऑर्डर (Law & Order) पूरी तरह से ध्वस्त हो गया था। रिपोर्ट्स के अनुसार, कई उग्रवादी गुटों ने पुलिस थानों पर हमले किए और वहां से भारी मात्रा में हथियार लूट लिए। यह भी कहा जा रहा है कि कुछ विदेशी ताकतें, खासकर म्यांमार से, इन विद्रोही समूहों को समर्थन मिल रहा है। हथियारों की लूट और बढ़ते हमलों को देखते हुए अब सरकार ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि हथियार सात दिनों के भीतर वापस नहीं किए गए, तो कठोर कार्रवाई की जाएगी। इस आदेश का पालन न करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे, जो किसी भी सूरत में माफ नहीं किए जाएंगे।
मणिपुर में हिंसा का असर आम जनता पर सबसे ज्यादा पड़ा है। बीते 20 महीनों में हजारों लोग विस्थापित हो चुके हैं। उनके घर जला दिए गए, उनकी नौकरियां चली गईं, और जीवन अस्त-व्यस्त हो चुका है। इस संकट का सबसे ज्यादा असर युवाओं पर पड़ा है। हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि हर दिन किसी न किसी को अपनी जान गंवानी पड़ रही है। सरकार ने युवाओं से अपील की है कि वे हथियार छोड़कर शांति बहाली में योगदान दें। लेकिन यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि जब हालात बेकाबू हो जाते हैं, तो नफरत और बदले की भावना लोगों के दिमाग पर हावी हो जाती है।
अब देखना यह होगा कि सरकार की यह चेतावनी कितनी प्रभावी होती है। क्या वाकई में लोग हथियार सरेंडर करेंगे या फिर हिंसा का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा? मणिपुर में सेना पहले से ही मौजूद है, और वहां सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (AFSPA) लागू है। लेकिन अब कयास लगाए जा रहे हैं कि यदि स्थिति नहीं सुधरी, तो सेना को और अधिक कड़ा रुख अपनाना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार ने इस समस्या को जल्द हल नहीं किया, तो मणिपुर का संकट और गहरा सकता है। जातीय संघर्ष को शांत करने के लिए न केवल सुरक्षा बलों को बल्कि राजनेताओं और सामाजिक नेताओं को भी आगे आना होगा। अब सवाल यह उठता है कि क्या यह सात दिन की चेतावनी पर्याप्त होगी, या फिर राज्य को और बड़े संकट का सामना करना पड़ेगा?
मणिपुर की इस हिंसा ने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इतनी भीषण स्थिति क्यों उत्पन्न हो गई। क्या प्रशासन की नाकामी थी, या फिर यह एक सुनियोजित षड्यंत्र था? ये सवाल अभी अनुत्तरित हैं, लेकिन एक बात साफ है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो मणिपुर का संकट और भी भयावह हो सकता है।