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Arctic Disaster! 20°C Rise, Ice Melting – बर्फ तेजी से पिघली

NCIvimarshRN1 month ago

Arctic Disaster! 20°C Rise, Ice Melting

 आर्कटिक क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन (climate change) के असर अब और भी स्पष्ट हो चुके हैं। हाल ही में वैज्ञानिकों ने पाया कि नॉर्थ पोल का तापमान सामान्य से 20 डिग्री सेल्सियस अधिक पहुंच गया है, जो एक बेहद गंभीर चेतावनी है। यह बढ़ोतरी न केवल बर्फ के तेजी से पिघलने का संकेत देती है, बल्कि पूरी पृथ्वी के जलवायु तंत्र (climate system) में बड़े बदलाव का इशारा कर रही है। वैज्ञानिक इस घटना को “एक्सट्रीम विंटर वार्मिंग इवेंट” (extreme winter warming event) बता रहे हैं, जो दर्शाता है कि आर्कटिक क्षेत्र में जलवायु असंतुलन (climate instability) बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है।

इस घटना को समझने के लिए पहले हमें यह जानना होगा कि आर्कटिक क्षेत्र पृथ्वी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र पूरी दुनिया के लिए रेफ्रिजरेटर (refrigerator) की तरह काम करता है, क्योंकि वहां की बर्फ सूरज की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में भेजने में मदद करती है, जिससे पृथ्वी ठंडी बनी रहती है। लेकिन जैसे-जैसे बर्फ पिघल रही है, वैसे-वैसे समुद्री सतह (sea surface) ज्यादा गर्म होती जा रही है और यह गर्मी वायुमंडल (atmosphere) में वापस लौट रही है, जिससे पूरी जलवायु प्रणाली असंतुलित हो रही है।

आर्कटिक में तापमान वृद्धि के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण आइसलैंड (Iceland) के पास बना गहरा कम दबाव का क्षेत्र (deep low-pressure system) है। जब किसी क्षेत्र में लो प्रेशर सिस्टम (low-pressure system) बनता है, तो उसके आसपास का उच्च दबाव (high pressure) क्षेत्र हवा को उस दिशा में धकेलता है। इस बार आइसलैंड के पास बने इस लो प्रेशर सिस्टम ने गर्म हवाओं को सीधे आर्कटिक की ओर भेजा, जिससे वहां का तापमान तेजी से बढ़ा। इसके अलावा, नॉर्थ ईस्ट अटलांटिक (North East Atlantic) में समुद्री सतह का तापमान पहले से ही अधिक था, जिससे गर्म हवाओं की तीव्रता और बढ़ गई।

एक अन्य कारण एल्बिडो इफेक्ट (Albedo Effect) भी है। आमतौर पर, जब सूरज की किरणें बर्फीले क्षेत्र पर पड़ती हैं, तो उसका अधिकांश हिस्सा अंतरिक्ष में वापस परावर्तित (reflect) हो जाता है। लेकिन अब जब बर्फ तेजी से पिघल रही है, तो समुद्री पानी ज्यादा मात्रा में सूरज की गर्मी को अवशोषित (absorb) कर रहा है, जिससे और अधिक तापमान बढ़ रहा है। यह एक दुष्चक्र (vicious cycle) बन चुका है, जहां बर्फ पिघलने से और ज्यादा गर्मी पैदा हो रही है और यह गर्मी और ज्यादा बर्फ पिघला रही है।

वैज्ञानिकों ने एक और महत्वपूर्ण कारण बताया है, जिसे “लैक ऑफ कन्वे क्शन” (Lack of Convection) कहा जाता है। सामान्य तौर पर जब सतह गर्म होती है, तो गर्म हवा ऊपर उठती है और ठंडी हवा नीचे आती है, जिससे गर्मी का संतुलन बना रहता है। लेकिन आर्कटिक क्षेत्र में यह संतुलन अब टूट रहा है। वहां की सतह गर्म हो रही है, लेकिन ऊपर की हवा उतनी तेजी से ठंडी नहीं हो रही है, जिससे गर्मी वहीं फंस रही है।

इस तेजी से बढ़ते तापमान का असर केवल आर्कटिक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा। समुद्र का जलस्तर (sea level) लगातार बढ़ रहा है और अगर यह प्रक्रिया यूं ही चलती रही, तो अगले कुछ दशकों में तटीय इलाकों (coastal areas) पर भारी संकट आ सकता है। कई छोटे द्वीप डूबने के कगार पर पहुंच सकते हैं और बाढ़ (floods) की घटनाएं बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, वैश्विक मौसम प्रणाली (global weather system) में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं, जिससे कई स्थानों पर सूखा (drought) और कहीं अत्यधिक वर्षा (extreme rainfall) हो सकती है।

साल 1850 से अब तक पृथ्वी का औसत तापमान (average global temperature) 1.3 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। यही कारण है कि 2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते (Paris Climate Agreement) में यह लक्ष्य रखा गया था कि तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं होने देना चाहिए। लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए, ऐसा लगता है कि यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि 1970 के बाद से आर्कटिक क्षेत्र का तापमान वैश्विक औसत से चार गुना तेजी से बढ़ रहा है।

जलवायु परिवर्तन की इस गंभीर समस्या का समाधान खोजना जरूरी है। कार्बन उत्सर्जन (carbon emissions) को कम करना, जीवाश्म ईंधन (fossil fuels) का उपयोग घटाना और नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) को अपनाना अब एक मजबूरी बन चुकी है। सरकारों को कड़े नियम लागू करने होंगे और आम लोगों को भी अपने जीवनशैली में बदलाव लाने होंगे। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग (international cooperation) और ठोस कदम उठाने की जरूरत है, नहीं तो आने वाले समय में पृथ्वी को बहुत गंभीर संकटों का सामना करना पड़ सकता है।

आर्कटिक में हो रहे बदलाव केवल वहां तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पूरे वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र (global ecosystem) को प्रभावित कर सकते हैं। वैज्ञानिकों की चेतावनी को गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि यह संकट अब सिर्फ भविष्य की चिंता नहीं, बल्कि वर्तमान की हकीकत बन चुका है। अगर इस पर जल्द ध्यान नहीं दिया गया, तो यह समस्या और भयावह हो सकती है।

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