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Time Travel in Ancient Hindu Texts! |
टाइम ट्रेवल (Time Travel) का विचार सुनते ही हमारे मन में जिज्ञासा और रोमांच का संचार होता है। यह अवधारणा सिर्फ साइंस फिक्शन फिल्मों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राचीन ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। विज्ञान इस विचार को एक कल्पना मानता है लेकिन साथ ही यह भी कहता है कि यह असंभव नहीं है। इस विषय में कई वैज्ञानिक थ्योरीज मौजूद हैं, जिनमें वर्महोल (Wormhole), कॉस्मिक स्ट्रिंग (Cosmic String), और स्पीड ऑफ लाइट (Speed of Light) जैसी अवधारणाएं शामिल हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर कोई यान प्रकाश की गति से चल सके, तो समय यात्रा संभव हो सकती है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि हजारों साल पहले सनातन ग्रंथों में इस तरह की अवधारणाओं का उल्लेख मिल जाता है।
हमारे धार्मिक ग्रंथों में कई ऐसे चरित्र हैं, जिन्हें विभिन्न युगों में विचरण करते हुए दिखाया गया है। उदाहरण के लिए, नारद मुनि को हर युग में देखा गया है, वे देवलोक से भूलोक तक बिना किसी बाधा के यात्रा कर सकते थे। इसी तरह राजा रेवत की कथा भी अत्यंत रोचक है। एक बार राजा रेवत अपनी बेटी के लिए योग्य वर की तलाश में ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मलोक में कुछ समय बिताने के बाद जब वे वापस लौटे, तो उन्होंने देखा कि धरती पर कई युग बीत चुके थे। ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि जिस दौरान वे वहां रुके थे, धरती पर चार युग बीत चुके थे। यह घटना स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि समय की गति अलग-अलग स्थानों पर भिन्न हो सकती है, ठीक वैसे ही जैसे आज के वैज्ञानिक कहते हैं कि ग्रैविटेशनल फील्ड (Gravitational Field) समय की गति को प्रभावित कर सकता है।
ऐसी ही एक और कथा कागभुशुंडी की है, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 11 बार रामायण और 16 बार महाभारत को घटित होते देखा। यह कथा बताती है कि वे समय की सीमाओं से परे थे। एक समय पर, जब भगवान शिव माता पार्वती को श्रीराम की कथा सुना रहे थे, तो कागभुशुंडी ने इसे चुपके से सुन लिया। इसके कारण उन्हें अतीत, वर्तमान और भविष्य की घटनाओं की पूरी जानकारी हो गई। गरुड़ जी को श्रीराम के अवतार पर संदेह था, जिसे दूर करने के लिए उन्हें कागभुशुंडी के पास भेजा गया। उन्होंने गरुड़ जी को संपूर्ण राम कथा सुनाई और समझाया कि समय कैसे विभिन्न रूपों में कार्य करता है।
इसके अलावा महाभारत में भी टाइम ट्रेवल के संकेत मिलते हैं। महाभारत के अंश बताते हैं कि अर्जुन को श्रीकृष्ण ने विराट रूप दिखाया था, जिसमें उन्होंने पूरे ब्रह्मांड का दर्शन किया। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो यह मल्टीवर्स (Multiverse) या समय की भिन्न धाराओं का एक उदाहरण हो सकता है। कई वैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि समय का स्वरूप बहुस्तरीय है और ब्रह्मांड में कई समानांतर समय धाराएं (Parallel Time Streams) हो सकती हैं।
टाइम ट्रेवल का जिक्र सिर्फ भारतीय पौराणिक कथाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई अन्य प्राचीन ग्रंथों में भी समय यात्रा की अवधारणाएं मिलती हैं। लेकिन सनातन संस्कृति में इसे एक विशेष स्थान प्राप्त है। यहां न केवल भूत और भविष्य का वर्णन मिलता है, बल्कि समय को चक्रीय (Cyclic) भी माना गया है। यह पश्चिमी सभ्यता की सोच से बिल्कुल अलग है, जहां समय को एक सीधी रेखा (Linear) के रूप में देखा जाता है।
अगर हम आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से देखें, तो अल्बर्ट आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी (Theory of Relativity) भी समय के सापेक्षता (Time Dilation) की पुष्टि करती है। इसका अर्थ यह है कि यदि कोई वस्तु अत्यधिक गति से चलती है, तो उसके लिए समय धीमा हो जाता है। यह अवधारणा हमारे धर्म ग्रंथों में वर्णित घटनाओं से मेल खाती है, जहां देवताओं और ऋषियों की समय यात्रा का उल्लेख मिलता है।
विज्ञान और आध्यात्मिकता के बीच इस संबंध को समझने की आवश्यकता है। जिस प्रकार विज्ञान धीरे-धीरे उन तथ्यों को प्रमाणित कर रहा है जो हजारों साल पहले हमारे ऋषियों और मुनियों ने बता दिए थे, वैसे ही भविष्य में हो सकता है कि टाइम ट्रेवल एक वास्तविकता बन जाए। आज विज्ञान जिन अवधारणाओं को सिद्ध करने में लगा है, वे हमारे ग्रंथों में सदियों पहले से लिखी जा चुकी हैं। यह सिर्फ एक संयोग नहीं हो सकता।
टाइम ट्रेवल को लेकर कई रहस्य आज भी अनसुलझे हैं। लेकिन यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि सनातन संस्कृति में इसकी कल्पना बहुत पहले ही की जा चुकी थी। यह सिर्फ एक धार्मिक धारणा नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक संभावना भी है। हो सकता है कि भविष्य में हम भी उन रहस्यों को उजागर कर पाएं, जिनका संकेत हमारे प्राचीन ग्रंथों में पहले ही दिया जा चुका है।