Vijay Ganpati Sadhna: भगवान गणपति के अनगिनत रूप हैं, और प्रत्येक रूप अपनी-अपनी साधनाओं में विशिष्ट फलदायक माना जाता है। लेकिन सभी साधकों ने एकमत से स्वीकार किया है कि गृहस्थ जीवन की पूर्णता के लिए यदि कोई साधना सर्वश्रेष्ठ है, तो वह है विजय गणपति साधना। इस साधना को इसलिए श्रेष्ठतम माना गया है, क्योंकि यह गृहस्थ व्यक्ति को “भोग और मोक्ष” दोनों प्रदान करने में समर्थ है, जिससे जीवन सभी दृष्टियों से परिपूर्ण हो जाता है।
विजय गणपति विग्रह की महिमा
विजय गणपति विग्रह को केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठतम वरदान माना गया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक बार यदि यह विग्रह “मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त” हो जाए, तो यह स्वयं ही सिद्धिदायक बन जाता है। इसके बाद प्रतिदिन जटिल विधि-विधान से पूजा-अर्चना की आवश्यकता नहीं होती। जिस प्रकार अगरबत्ती अपनी सुगंध हर जगह फैलाती है, उसी प्रकार विजय गणपति विग्रह जहाँ भी स्थापित होते हैं—चाहे वह आपका पूजा कक्ष हो, कारखाना हो, फर्म हो या फैक्ट्री—वहाँ वे ऋद्धि-सिद्धि, उन्नति और सफलता देने में सहायक होते हैं।
कलयुग में गणपति को शीघ्र फलदायक देवता माना गया है, और किसी भी शुभ कार्य से पहले उनकी पूजा अनिवार्य है। यही कारण है कि महाराष्ट्र में गृहस्थ लोग विजय गणपति की स्थापना को परम शुभ मानते हैं, और भारत के बाहर बाली, जावा, और सुमात्रा जैसे द्वीपों में भी इनके भव्य मंदिर स्थापित हैं।
स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा की विधि
विजय गणपति साधना का पहला चरण विग्रह की तैयारी है।
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विग्रह निर्माण: साधक को स्वयं किसी श्रेष्ठ शुभ मुहूर्त में गणपति की मूर्ति बनानी चाहिए या किसी योग्य कारीगर से धातु निर्मित मूर्ति का निर्माण कराना चाहिए। धातु निर्मित विग्रह श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि यह कई पीढ़ियों तक सुरक्षित रहता है।
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स्थापना: जब गणपति विग्रह तैयार हो जाए, तब उसे पुष्य नक्षत्र में अभिषेक द्वारा साधना कक्ष में स्थापित करना चाहिए।
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संजीवनीकरण: स्थापना के बाद, षोडशोपचार पूजा संपन्न की जाती है। इसके साथ ही, विशेष मंत्रों से इसका संजीवनीकरण किया जाता है, और पूर्ण विधि-विधान के साथ प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। इन प्रक्रियाओं के बाद ही मूर्ति चैतन्य और फलदायक बनती है।
मंत्र और अभिषेक का विधान
प्राण प्रतिष्ठा के बाद, विग्रह को सिद्ध और चैतन्य बनाने के लिए विशिष्ट मंत्रों का प्रयोग किया जाता है:
1. गणेश गायत्री मंत्र द्वारा अभिषेक
सबसे पहले, गणपति विग्रह पर गणेश गायत्री मंत्र से अभिषेक किया जाता है।
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मंत्र: एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥
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विधान: इस अभिषेक में दूर्वा, जल और दूध का प्रयोग होता है, और यह क्रिया निरंतर 1100 (ग्यारह सौ) बार गायत्री मंत्र के साथ की जाती है।
2. सर्व सिद्धि गणपति मंत्र का जप
अभिषेक संपन्न होने के बाद, सर्व सिद्धि गणपति मंत्र का जप एक लाख (1,00,000) बार करना चाहिए।
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मंत्र: ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गणेश्वराय ब्रह्मस्वरूपाय चारवे सर्व सिद्धि प्रदेशाय विघ्नेशाय नमो नमः॥
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फल: यह बत्तीस अक्षर का मंत्र संपूर्ण कामनाओं को देने वाला और धर्म, अर्थ, काम, एवं मोक्ष को फलदायक माना गया है। इस जप से विग्रह पूर्ण सिद्धिदायक हो जाता है।
3. गणपति चैतन्य मंत्र
अंत में, गणपति को पूरी तरह चैतन्य करने के लिए 21,000 (इक्कीस हज़ार) बार गणपति चैतन्य मंत्र का जप किया जाता है।
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मंत्र: ॐ गं गौं गणपतये विघ्नविनाशिने स्वाहा॥
इस प्रकार, अनंत कालातीत साधना से जब विग्रह पूर्णतः चैतन्य हो जाता है, तो वह मूर्ति या विग्रह अनंत समय तक फलदायक बनी रहती है। विजय गणपति साधना हर गृहस्थ के लिए अत्यंत ही आवश्यक और तुरंत फलदायक है। यह साधना सिखाती है कि भौतिक समृद्धि के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी संभव है। जिस घर में मंत्र चैतन्य सिद्धिदायक धातु निर्मित विजय गणपति विग्रह स्थापित होता है, वह घर धन्य माना जाता है।
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