Panchanguli sadhana: क्या आप अपने भविष्य के रहस्यों को जानना चाहते हैं? क्या आप काल की दीवारों के पार देखने की शक्ति हासिल करना चाहते हैं? पंचांगुली साधना एक ऐसी ही अद्भुत और प्राचीन तांत्रिक/आध्यात्मिक क्रिया है जो साधक को दिव्य दृष्टि और काल ज्ञान प्रदान करती है। यह केवल हस्तरेखा विज्ञान को सिद्ध करने की तकनीक नहीं है, बल्कि यह पंचांगुली देवी की चैतन्य शक्ति को जाग्रत करती है, जिससे साधक स्वयं के साथ-साथ दूसरों के भूत, वर्तमान और भविष्य को भी स्पष्ट रूप से जान पाता है।
पंचांगुली साधना क्यों है सर्वश्रेष्ठ?
मनुष्य हमेशा से ही अपने अज्ञात भविष्य को लेकर उत्सुक रहा है। आज हस्त रेखा विज्ञान, ज्योतिष और टैरो जैसी कई पद्धतियाँ मौजूद हैं, लेकिन पंचांगुली साधना इन सब में श्रेष्ठ मानी जाती है क्योंकि यह सीधे ब्रह्माण्ड में व्याप्त काल ज्ञान के अणुओं से साधक की आत्म-शक्ति का सम्बन्ध स्थापित करती है।
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मूल स्वरूप: पंचांगुली मूलतः सम्मोहन की साधना है।
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प्रवर्तक: इस विद्या के प्रमुख प्रवर्तक अंगिरस, कणाद और अत्रेय ऋषि थे।
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लक्ष्य: इस साधना से साधक को होने वाली घटनाओं और दुर्घटनाओं का पूर्वानुमान हो जाता है, जिससे वह स्वयं की और समाज की रक्षा कर सकता है।
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दिव्य शक्ति: यह साधना साधक को संजय के समान दिव्य दृष्टि प्रदान करती है, जिससे बिना सामने व्यक्ति के भी उसका भविष्य जाना जा सकता है।
पंचांगुली देवी काल ज्ञान की देवी हैं, जिनकी साधना करके साधक हस्त विज्ञान में पारंगत होता है और भविष्यवक्ता बन सकता है।
पंचांगुली साधना का सरल विधान (21 दिन की प्रक्रिया)
पंचांगुली साधना एक इक्कीस दिन की प्रक्रिया है, जिसे सही विधि से करने पर ही सफलता मिलती है।
1. साधना सामग्री और शुभ समय
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आवश्यक सामग्री: प्राण प्रतिष्ठायुक्त एवं मंत्र-सिद्ध पंचांगुली यंत्र व कवच और रुद्राक्ष माला का उपयोग करें।
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शुभ दिन: यह साधना शुक्ल पक्ष की किसी भी द्वितीया, पंचमी, सप्तमी या पूर्णमासी को की जा सकती है।
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समय: इसे केवल प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में ही करना चाहिए।
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स्थान: साधना एकांत स्थल या पूजा स्थल में करें, जहाँ कोई शोर न हो।
2. बैठने की विधि
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दिशा और वस्त्र: पीले आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और पीले वस्त्र धारण करें।
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यंत्र स्थापना: एक बाजोट (चौकी) पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर तांबे की प्लेट में पंचांगुली देवी का यंत्र (ताबीज) स्थापित करें।
3. पूजन विधि
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सर्वप्रथम गणपति और फिर गुरुदेव का ध्यान करें।
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गुरु ध्यान के बाद स्नान, पंचोपचार पूजन और गुरु मंत्र जप सम्पन्न करें।
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षोडशोपचार पूजन के लिए यंत्र पर कुंकुम से स्वस्तिक का चिह्न बनाएँ।
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षोडशोपचार विधि से देवी का विधिवत् पूजन करें (ध्यान, आवाहन, आसन, स्नान, वस्त्र, गन्ध, अक्षत, पुष्प, दीप, नैवेद्य, दक्षिणा और विशेषार्घ्य)।
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हाथ में जल लेकर मंत्र-जप का संकल्प करें।
4. पंचांगुली मंत्र जप
संकल्प के बाद, साधक को रुद्राक्ष माला से निम्नलिखित मंत्र का जप इक्कीस दिन तक पाँच-पाँच माला रोज़ाना करना चाहिए:
साधना काल में ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण नियम
सफलता सुनिश्चित करने के लिए साधक को दृढ़ता से इन नियमों का पालन करना चाहिए:
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मन की स्थिति: साधना तभी शुरू करें जब आप दृढ़ चित्त हों और संघर्षों से जूझने की शक्ति रखते हों।
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ब्रह्मचर्य: साधना काल में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें और स्त्री सम्पर्क से दूर रहें।
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आचरण: असत्य भाषण न करें और तामसिक भोजन से दूर रहें।
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नियमितता: मंत्र जप का समय निर्धारित होना चाहिए और जप के बीच में उठना नहीं चाहिए।
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विश्वास: गुरु के प्रति अटूट आस्था रखें और मंत्रोच्चारण शुद्ध तथा स्पष्ट हो।
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साधना समाप्ति: साधना पूरी होने पर समस्त सामग्री को किसी नदी या कुएं में विसर्जित कर दें।
पंचांगुली साधना को सिद्ध करना जीवन की श्रेष्ठता है। यदि पूर्ण विश्वास के साथ यह साधना सम्पन्न की जाती है, तो साधक को मंत्र की सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है और वह भूत, भविष्य एवं वर्तमान का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेता है।











