Varanasi yatra Breaking : जहां मृत्यु भी उत्सव है! ….हर हर महादेव

By NCI
On: November 8, 2025 5:38 PM
varanasi yatra
By Dhanvansha Pandit

Varanasi yatra: आप सभी को जय श्री महाकाल! बद्रीनाथ की शीतल, दिव्य हवाओं से निकलकर जब मैं जगन्नाथ पुरी की ओर बढ़ रहा था तो भीतर एक अजीब सा खिंचाव था—जैसे यात्रा अभी पूरी नहीं हुई, जैसे कोई आध्यात्मिक धागा मुझे एक जगह से दूसरी जगह खींच रहा हो। ट्रेन बनारस की ओर बढ़ रही थी और खिड़की से आती हवा में मुझे हिमालय की यादें भी महसूस हो रही थीं और साथ ही गंगा तट की एक अजीब सी पुकार भी सुनाई दे रही थी। रातभर सफ़र के बाद जब ट्रेन धीरे-धीरे बनारस स्टेशन में दाखिल हुई तो ऐसा लगा जैसे शहर खुद अपनी धड़कनों के साथ मेरा स्वागत कर रहा हो। स्टेशन की चहल-पहल, पुकारते कुली, चाय की केतली की सीटी और हवा में तैरती हल्की सी अगरबत्ती की महक से मैं समझ गया कि एक बिल्कुल अलग संसार में पहुंच चुका हूँ। होटल जाकर जल्दी से फ्रेश हुआ पर मन में इतनी बेचैनी थी कि कमरे की दीवारें भी रोक नहीं पा रही थीं। एक ही आवाज़ थी भीतर—“चल, बाबा बुला रहे हैं।”

सबसे पहले मैं भगवान काल भैरव के दरबार पहुंचा, क्योंकि बनारस में मान्यता है कि बिना उनके दर्शन किए बाकी किसी देवता के दर्शन अधूरे रहते हैं। उस मंदिर में कदम रखते ही एक ऐसी ऊर्जा महसूस हुई जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। वहां बैठी भीड़ में ऐसी शांति थी जैसे हर व्यक्ति किसी अदृश्य धागे से प्रभु से जुड़ा हुआ हो। भैरव बाबा के सामने खड़े होकर शरीर सिहर उठा, आंखें अपने-आप बंद हो गईं और भीतर से लगा कि जिंदगी की सारी उलझनें, सारे डर, सारी चिंता किसी ने धीरे-धीरे उठा ली हो। भैरव बाबा की मूर्ति के तेज ने मुझे क्षणभर के लिए थाम लिया—जैसे एक अदृश्य हाथ कंधे पर रखा हो, आश्वस्त करता हुआ कि आगे की राह में कोई डर नहीं। वहां से निकलकर मैं जब काशी विश्वनाथ के लिए चला तो दिल में एक अलग ही धड़कन थी।

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                                                                                           varanasi yatra

काशी विश्वनाथ मंदिर की ओर बढ़ते हुए Ganga की तरफ से उठती ठंडी हवा और गलियों में गूंजता “हर हर महादेव” ऐसा लग रहा था मानो पूरा शहर सांसों में महादेव को जप रहा हो। मंदिर के बाहर भीड़ थी, लंबी लाइनें थीं लेकिन हर चेहरे पर संतोष, श्रद्धा और एक अजीब सा सुकून था। लाइन में खड़े-खड़े भी कोई बेचैनी नहीं थी, उल्टा ऐसा लग रहा था कि हर कदम के साथ मैं प्रभु के और करीब जा रहा हूँ। जैसे ही बाबा विश्वनाथ की झलक मिली, दिल जैसे अचानक ठहर गया। ऐसा लगा मानो समय थम गया हो… आंखों में आंसू थे, लेकिन वो दुख के नहीं थे, वो उस अद्भुत अनुभव के थे जिसे कोई समझे भी तो कैसे? वहां खड़े-खड़े मैंने बस यही महसूस किया कि जीवन की भागदौड़ में जो हम भूल जाते हैं, वो यहां आकर फिर याद हो जाता है कि हम भटके हुए नहीं हैं, कोई हमें देख रहा है, थाम रहा है, और राह दिखा रहा है। बाबा के दर्शन और वहाँ उपस्थित सभी देवी देवताओं के दर्शन से दिल इतना प्रसन्न हो गया की पूछो मत।

शाम तक मैं गंगा घाट की ओर खिंचा चला गया। गंगा सिर्फ नदी नहीं, मां है और जब मैंने पहला कदम दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर रखा तो मन आनंदित हो उठा। गंगा नदी मे कदम रखू उससे पहले एक बात दिमाग मे आया की सबसे पहले माँ को प्रणाम करो क्यूंकी जो मेरे शंकर की जटा से निकली है वो भगवती पूजनीय है और उन्मे अपने चरण लगाने से पहले प्रणाम और क्षमा जरूरी है । फिर अपना पहला कदम गंगा नदी मे रखा,  ठंडे जल ने मानो पूरे यात्रा की थकान को पल भर मे सोख लिया हो, जैसे माँ के आँचल मे सुकून मिलता है वैसा ही सुकून माँ गंगा के स्पर्श से मिला। वहां से आगे बढ़ते-बढ़ते मैं मणिकर्णिका घाट पहुंच गया। मणिकर्णिका पर खड़े होकर जीवन की सच्चाई सामने खुली खड़ी थी—जहां एक ओर चिता की आग जीवन के अंत की कहानी कहती है, वहीं दूसरी ओर चिता की राख गंगा मे बहकर नए आरंभ का संदेश देती है। यहां खड़े होकर लगता है कि मृत्यु कोई डर नहीं बल्कि एक यात्रा है, एक दरवाज़ा है दूसरी ओर के सफ़र का। जिस तरह लोग चुपचाप, बिना किसी घबराहट के अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार करते हैं वो देखकर भीतर एक समझ जागती है कि जीवन और मृत्यु के बीच जो दूरी हम समझते हैं, वो उतनी बड़ी नहीं होती जितनी हम मान लेते हैं। बनारस में ये सब इतनी सहजता से होता है कि आप चाहें या न चाहें, जिंदगी की असलियत आपको छू ही लेती है।

फिर मैं काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की ओर बढ़ा। पहले की तंग, अंधेरी, अक्सर गंदी दिखने वाली गलियाँ अब जैसे किसी नए जीवन में बदल चुकी थीं। चौड़े रास्ते, चमचमाती फर्श, किनारों पर लगी पेंटिंगें, हवा में हल्की चंदन की खुशबू—सबकुछ इतना साफ, इतना व्यवस्थित कि पहली बार लग रहा था कि बनारस ने खुद को नए रूप में गढ़ लिया है। चलते-चलते ऐसा लग रहा था जैसे कोई राजमार्ग हो, जहां हर कदम पर इतिहास और अध्यात्म साथ-साथ चलते हों। पहले जहां एक भीड़भाड़ वाली, धक्का-मुक्की वाली जगह हुआ करती थी, वहां अब खुलापन था, सांस लेने की जगह थी, और भक्तों के चेहरे पर एक सहज मुस्कान। ये बदलाव सिर्फ दीवारों और रास्तों में नहीं था, ये बदलाव उस अनुभव में था जो आपको देवालय तक पहुंचने के हर कदम में महसूस होता है। सच में, कॉरिडोर बनारस को नए युग में ले आता है, बिना उसकी आत्मा छुए।

यात्रा के बीच भूख भी लगी और बनारस का खाना तो खुद में एक तीर्थ है। सबसे पहले मैंने मलाईदार, गाढ़ी और ठंडी लस्सी का बड़ा सा ग्लास लिया। जैसे ही पहला घूंट लिया, शरीर को एक मीठी ठंडक मिली—ऊपर जमी मलाई इतनी नर्म कि मानो मुंह में रखते ही घुल जाए। फिर चाट की बारी आई टमाटर चाट, दही चाट, पापड़ी चाट… हर चीज का स्वाद जैसे बनारस की तरह अनोखा। मसालों का संतुलन, कुरकुरी पापड़ी, ऊपर से हल्की मीठी चटनी—हर कौर में आनंद था। दही बड़े इतने मुलायम कि चम्मच लगाते ही टूट जाते। फिर मीठे में गरमा-गरम गुलाब जामुन—ऐसे रसीले कि एक को तोड़ा नहीं, सीधे मुंह में रखा और बस आंखें बंद हो गईं। और अंत में बनारस का प्रसिद्ध पान। वो मीठा पान जिसमें गुलकंद की सुगंध, सौंफ की ताजगी और पत्ते का स्वाद एक साथ मिलता है… ऐसा पान कहीं और नहीं मिलता। ये सब खाकर मन ही नहीं, आत्मा तक तृप्त हो गई।

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रात को मैं फिर घाट पर लौटा क्योंकि गंगा आरती देखने का अपना ही आनंद है। हवा में धूप-अगरबत्ती की महक, घंटियों की मधुर ध्वनि, घाट के सामने पंडित जी जिस तरीके से आरती का दिया घूम रहे थे ऐसा लग रहा था जैसे धरती और आसमान एक साथ जप कर रहे हों। आरती के बाद मैं नाव में बैठ गया और गंगा की शांत लहरों पर बहता हुआ वो दृश्य देखता रहा—चारों ओर दीपक, घाट की जगमगाहट, और चाँद की रौशनी से चमचमाते मंदिर। पानी पर पड़ती रोशनी ऐसा दृश्य बनाती है जिसे कोई शब्द पूरी तरह कैद नहीं कर सकते। वो शांति, वो सुकून… ऐसा लगता है जैसे इस नदी ने सदियों से हर भक्त की थकान अपने अंदर समेटी है। उस रात गंगा के बीच बैठकर मुझे लगा कि ये यात्रा सिर्फ स्थान बदलने का सफर नहीं, बल्कि भीतर के बदलाव का अनुभव है। बनारस ने मुझे फिर से याद दिलाया कि जीवन कितना छोटा है, कितना सुंदर है, और कितना पवित्र भी… और इसी एहसास के साथ अब मेरा अगला पड़ाव था जगन्नाथपुरी। अगले लेख में मैं आपको जय जगन्नाथ का अनुभव बताऊँगा। तब तक के लिए आप सब खुश रहिए, धर्म की मार्ग पर चलिए, जय श्री महाकाल!

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