लेखक - धनवंश पंडित via NCI
यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि जिस धरा पर सहस्राब्दियों से ऋषियों ने चेतना के विज्ञान को गढ़ा, आज उसी धरा की आधुनिक पीढ़ी अपनी ही सांस्कृतिक धरोहर को “पिछड़ेपन” का पर्याय मानकर खारिज करने में गर्व अनुभव करती है। मस्तक पर तिलक और कलाई पर मौली (कलावा) को मात्र एक धार्मिक चिन्ह या आडंबर समझ लेना हमारी बौद्धिक दरिद्रता का ही परिचायक है, जबकि यथार्थ के धरातल पर ये सनातनी अस्मिता, सुरक्षा और आध्यात्मिक विज्ञान के ऐसे सशक्त हस्ताक्षर हैं, जिन्हें नकारा नहीं जा सकता। तिलक, जो भारतीय संस्कृति में ‘सौभाग्य’ और ‘तेजस्विता’ का द्योतक है, केवल एक रंगीन द्रव्य नहीं है जिसे माथे पर पोत दिया जाए; यह तो उस ‘आज्ञा चक्र’ का जागरण है जो दोनों भौहों के मध्य स्थित होकर हमारी प्रज्ञा और एकाग्रता को नियंत्रित करता है। यह तिलक ही है जो वैचारिक प्रदूषण और नकारात्मकता के मध्य एक अभेद्य कवच का कार्य करता है, जिसे धारण करते ही मन में एक सात्विक शीतलता और सात्विक अहंकार का संचार होता है कि हम उस सनातन परंपरा के वाहक हैं, जिसका आदि और अंत काल से परे है।
परंतु, आज की तथाकथित ‘प्रगतिशील’ जमात को तिलक लगाने की शास्त्रीय विधि का तनिक भी भान नहीं है; किसी भी उंगली से, कैसे भी तिलक लगा लेना अब एक रस्म अदायगी भर रह गया है। शास्त्रों का स्पष्ट उद्घोष है कि तिलक लगाने के लिए ‘अनामिका’ (Ring Finger) का ही प्रयोग सर्वाधिक शुभ और फलदायी है, क्योंकि इसका सीधा संबंध सूर्य पर्वत और सूर्य तत्व से है, जो तेज और मान-सम्मान का कारक है। तिलक लगाते समय अंगूठे की सहायता से उसे नीचे से ऊपर की ओर, अर्थात आज्ञा चक्र से सहस्रार की ओर ले जाना चाहिए। यह मात्र एक शारीरिक क्रिया नहीं, अपितु उर्ध्वगामी होने का, निम्नतर वृत्तियों से उच्चतर चेतना की ओर उठने का संकेत है। इसके पश्चात उस पर अक्षत (चावल) लगाना, जीवन में पूर्णता और अखंडता की कामना है। स्मरण रहे, तिलक कभी भी शुष्क नहीं होना चाहिए; रोली, हल्दी, कुमकुम, चंदन अथवा अष्टगंध में थोड़ा जल मिश्रित कर ही तिलक तैयार किया जाता है, क्योंकि स्नेह और आर्द्रता ही संबंधों और भक्ति का आधार है। देवताओं के निमित्त भी विधान स्पष्ट है, विष्णु और कृष्ण के लिए पीला या लाल चंदन, शक्ति स्वरूपा देवियों के लिए कुमकुम-सिंदूर और महादेव के लिए भस्म या त्रिपुंड—यह विविधता ही हमारी संस्कृति की वैज्ञानिकता को दर्शाती है। घर में आए अतिथि का सत्कार तिलक से करना, उसे साक्षात देवतुल्य मानने की हमारी उदार परंपरा का ही विस्तार है।
अब चर्चा करते हैं उस रक्षा-सूत्र की जिसे कलाई पर बाँधने में आज के युवाओं को ‘आउटडेटेड’ होने का भय सताता है। कलाई पर बँधी लाल मौली या कलावा कोई सामान्य धागा नहीं, अपितु एक अभिमंत्रित ‘रक्षा कवच’ है। पौराणिक आख्यानों का स्मरण करें तो ज्ञात होता है कि देवासुर संग्राम में भी इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधकर ही उन्हें विजयश्री के लिए विदा किया था और दानवीर राजा बलि को भी इसी रक्षा-सूत्र ने वचनबद्ध किया था—“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः”। कलावा धारण करना त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और त्रिदेवियों (लक्ष्मी, पार्वती, सरस्वती) की सामूहिक कृपा और शक्ति को अपनी नाड़ी में स्पंदित अनुभव करना है। यह आध्यात्मिक सुरक्षा के साथ-साथ एक मनोवैज्ञानिक संबल भी है; जब-जब दृष्टि कलाई पर बँधे उस लाल सूत्र पर पड़ती है, अंतर्मन को यह विश्वास दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं, दैवीय शक्तियाँ हमारे रक्षण हेतु तत्पर हैं।
अंततः, प्रश्न यह उठता है कि हम इस परंपरा को नित्य जीवन में क्यों उतारें? उत्तर सीधा और स्पष्ट है—घर से निकलते समय यदि हम दर्पण में अपना बाह्य सौंदर्य निहारना नहीं भूलते, तो फिर अपने आंतरिक सुरक्षा हेतु तिलक और मौली धारण करना विस्मृत क्यों हो जाता है? नित्य ईष्टदेव को नमन कर, स्वयं के मस्तक पर तिलक और कलाई पर कलावा धारण करना दिनभर की मानसिक शांति और सुरक्षा की गारंटी है। यह केवल धार्मिक कृत्य नहीं, अपितु एक अनुशासनात्मक जीवन शैली है। यदि गले में विदेशी दासता का प्रतीक ‘टाइ’ (Tie) बाँधने में हमें शर्म नहीं आती, तो कलाई पर अपनी संस्कृति का प्रतीक ‘कलावा’ और मस्तक पर ‘तिलक’ धारण करने में संकोच कैसा? अतः, हर सनातनी को चाहिए कि वह इस हीनभावना का त्याग कर गर्व से तिलक और मौली धारण करे, क्योंकि यही हमारी पहचान है यही हमारा गौरव है और यही हमारा रक्षक है।













