लेखिका- उमा जी झा via NCI
Ram Navami Special: आज जब पूरे देश में राम नवमी का उल्लास है, तो हवा में एक अलग ही पवित्रता और ठहराव महसूस होता है। यह सिर्फ एक त्योहार या कैलेंडर में दर्ज कोई छुट्टी का दिन नहीं है, बल्कि यह भारत की उस साझी चेतना का उत्सव है जो सदियों से हमारे भीतर धड़क रही है। 2026 की इस राम नवमी की अहमियत इसलिए भी बहुत खास हो जाती है क्योंकि अयोध्या के भव्य मंदिर में रामलला के माथे पर जब दोपहर के ठीक बारह बजे सूर्य की किरणें ‘सूर्य तिलक’ करती हैं, तो लगता है जैसे प्रकृति और विज्ञान दोनों मिलकर उस परम सत्ता को अपना नमन कर रहे हों। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि सिर्फ पंचांग का एक पन्ना नहीं है; यह उस अटूट विश्वास का प्रतीक है जिसने अनगिनत पीढ़ियों को मुश्किल वक्त में हौसला दिया है। एक आम भारतीय के लिए राम सिर्फ मंदिरों में पूजे जाने वाले भगवान नहीं हैं, वे घर के एक ऐसे मार्गदर्शक और बुजुर्ग हैं जिनसे सुख-दुख साझा किए जा सकते हैं। आज के दिन जब कस्बों से लेकर महानगरों तक शंख और घंटियों की गूंज उठती है, तो वह यह याद दिलाती है कि राम हमारी संस्कृति और हमारे रोजमर्रा के जीवन के कितने गहरे हिस्से हैं।
एक पत्रकार की नजर से जब मैं आज के तेजी से भागते और अक्सर भटक जाते समाज को देखती हूँ, तो मुझे गहराई से लगता है कि हमें राम के आदर्शों की सबसे ज्यादा जरूरत आज ही है। हम एक ऐसी आपाधापी वाली दुनिया में जी रहे हैं जहां सफलता के नाम पर हर तरह का समझौता आम बात हो गई है और रिश्तों की डोर कमजोर पड़ रही है। ऐसे दौर में ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ का जीवन हमें थोड़ा रुककर सोचने पर मजबूर करता है। राम हमें यह सिखाते हैं कि अपार शक्ति और अधिकार पा लेना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, बल्कि असल महानता उस शक्ति को मर्यादा में बांधकर रखने और कमजोरों के भले के लिए उसका इस्तेमाल करने में है। उन्होंने एक आदर्श पुत्र, एक भरोसेमंद मित्र, एक न्यायप्रिय राजा और एक विनम्र योद्धा की जो मिसाल पेश की, वह समय की कसौटी पर कभी पुरानी नहीं पड़ सकती। आज जब समाज में स्वार्थ, दूरियां और टकराव बढ़ रहा है, तब राम का जीवन हमें अपना अहंकार त्यागकर सबको साथ लेकर चलने का पाठ पढ़ाता है। वनवास के दौरान शबरी के जूठे बेर खाना या निषादराज को गले लगाना केवल रामकथा के प्रसंग नहीं हैं; ये सामाजिक बराबरी और समरसता के वो कड़े और जरूरी सबक हैं जिन्हें आज के भारत को अपने समाज में बहुत गहराई से उतारने की दरकार है।
राम का राज्याभिषेक महज एक राजा का सिंहासन पर बैठना नहीं था, बल्कि यह ‘रामराज्य’ जैसी एक लोककल्याणकारी व्यवस्था की शुरुआत थी। रामराज्य का मतलब किसी एक धर्म या समुदाय के राज से नहीं है, बल्कि एक ऐसी आदर्श व्यवस्था से है जहां न्याय, करुणा और सत्य का बोलबाला हो और जहां आखिरी कतार में खड़े सबसे कमजोर व्यक्ति की भी बिना किसी भेदभाव के सुनवाई हो। एक नागरिक और एक लेखिका के तौर पर आज जब हम राम नवमी के दीये जला रहे हैं, तो हमें खुद के भीतर झांककर यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि क्या हम अपने अंदर बैठे रावण—यानी अपने क्रोध, नफरत और लालच—को हरा पाए हैं? अगर हम सचमुच राम के भक्त हैं, तो हमें उनके मूल्यों को अपनी जिंदगी में शामिल करना होगा। राम केवल अयोध्या के गर्भगृह में विराजमान नहीं हैं, वे उस हर दिल में बसते हैं जो सच के रास्ते पर चलता है, जो दूसरों का दर्द महसूस करता है और जो भारी दबाव में भी अपनी इंसानियत और नैतिकता नहीं छोड़ता। इस राम नवमी पर हमारी सबसे सच्ची पूजा यही होगी कि हम राम के चरित्र की उस करुणा और मर्यादा को अपने आचरण में उतारें और इस दुनिया को थोड़ा और खूबसूरत बनाने की कोशिश करें। जय श्री राम…
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