लेखक- विपिन चमोली via NCI
Gangotri Dham : भारत की देवभूमि उत्तराखंड में स्थित गंगोत्री धाम केवल एक मंदिर नहीं है, बल्कि यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था का वह पवित्र केंद्र है जहाँ स्वर्ग से धरती पर गंगा का अवतरण हुआ था। उत्तरकाशी जिले में स्थित यह पावन स्थल चार धाम यात्रा का एक प्रमुख पड़ाव है और समुद्र तल से लगभग 3,100 मीटर की ऊंचाई पर बसा हुआ है। जब आप यहाँ कदम रखते हैं, तो सबसे पहले आपके कानों में भागीरथी नदी की कलकल करती ध्वनि गूंजती है, जो किसी संगीत से कम नहीं लगती। यहाँ का वातावरण इतना शांत और पवित्र है कि मन की सारी चिंताएं अपने आप दूर हो जाती हैं। चारों ओर घने जंगल, बर्फ से ढके पहाड़ और उनके बीच बहती पवित्र नदी का दृश्य देखकर ऐसा लगता है मानो साक्षात ईश्वर ने इस जगह को अपने हाथों से सजाया हो। यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि प्रकृति प्रेमियों के लिए भी किसी जन्नत से कम नहीं है।
माँ गंगा के धरती पर आने की पौराणिक कथा
गंगोत्री मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा बेहद रोचक और प्रेरणादायक है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों को पापों से मुक्ति दिलाने और उन्हें मोक्ष प्रदान करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या का उद्देश्य माँ गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाना था, क्योंकि केवल गंगा के पवित्र जल से ही उनके पूर्वजों का उद्धार हो सकता था। राजा भागीरथ की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर माँ गंगा धरती पर आने के लिए तैयार तो हो गईं, लेकिन उनके वेग को संभालना धरती के बस की बात नहीं थी। तब भगवान शिव ने भागीरथ की प्रार्थना सुनी और गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर लिया, ताकि उनका प्रवाह नियंत्रित हो सके। गंगोत्री वही स्थान है जहाँ माँ गंगा ने पहली बार धरती को स्पर्श किया था। आज भी मंदिर के पास एक ‘भागीरथ शिला’ मौजूद है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसी चट्टान पर बैठकर राजा भागीरथ ने शिव जी की आराधना की थी।
मंदिर का इतिहास और उसकी अद्भुत बनावट
गंगोत्री का वर्तमान मंदिर 18वीं शताब्दी में गोरखा कमांडर अमर सिंह थापा द्वारा बनवाया गया था। यह मंदिर सफेद ग्रेनाइट के पत्थरों से बना है, जो इसकी सुंदरता और पवित्रता को और भी बढ़ा देता है। मंदिर की वास्तुकला बहुत ही सरल लेकिन अत्यंत आकर्षक है, जो पहाड़ी स्थापत्य कला का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती है। मंदिर की ऊंचाई लगभग 20 फीट है और इसके शिखर पर सोने का कलश स्थापित है, जो सूरज की रोशनी में चमकता हुआ बहुत दिव्य लगता है। मंदिर के अंदर माँ गंगा की एक सुंदर मूर्ति स्थापित है, जिनके दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु लंबी कतारों में खड़े रहते हैं। सर्दियों के मौसम में यहाँ भारी बर्फबारी होती है, जिसके कारण मंदिर के कपाट दीपावली के बाद बंद कर दिए जाते हैं और फिर अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं के लिए दोबारा खोले जाते हैं। सर्दियों के दौरान, माँ गंगा की डोली को मुखबा गाँव में ले जाया जाता है, जहाँ उनकी पूजा-अर्चना निरंतर चलती रहती है।
गौमुख: गंगा का वास्तविक उद्गम स्थल
हालाँकि गंगोत्री मंदिर माँ गंगा का मुख्य पूजा स्थल है, लेकिन भौगोलिक रूप से गंगा नदी (जो यहाँ भागीरथी कहलाती है) का वास्तविक उद्गम स्थल ‘गौमुख’ है, जो मंदिर से लगभग 19 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। गौमुख गंगोत्री ग्लेशियर का ही एक हिस्सा है और इसका आकार गाय के मुख जैसा है, इसीलिए इसे गौमुख कहा जाता है। कई साहसी श्रद्धालु और ट्रेकर्स गंगोत्री से पैदल यात्रा करके गौमुख तक जाते हैं ताकि वे उस पवित्र जल को उसकी उत्पत्ति के स्थान पर देख सकें। यह रास्ता बेहद कठिन और पथरीला है, लेकिन यहाँ के नज़ारे सारी थकान मिटा देते हैं। गौमुख से निकलती बर्फीली और तेज धारा को देखना एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। यहाँ का जल इतना पवित्र और शुद्ध माना जाता है कि श्रद्धालु इसे अपने साथ बोतलों में भरकर घर ले जाते हैं और पूजा-पाठ में इस्तेमाल करते हैं।
आत्मिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति
गंगोत्री धाम की यात्रा केवल एक शारीरिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह एक आत्मिक अनुभव है। यहाँ आकर जो शांति मिलती है, वह दुनिया के किसी भी कोने में मिलना मुश्किल है। शाम के समय मंदिर प्रांगण में होने वाली गंगा आरती का दृश्य मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है। दीयों की रोशनी, घंटियों की गूंज और भजनों का स्वर मिलकर एक ऐसा दिव्य माहौल बनाते हैं कि इंसान अपनी सुध-बुध खो बैठता है। ऐसा माना जाता है कि गंगोत्री में स्नान करने और माँ गंगा के दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। चाहे आप आस्तिक हों या नास्तिक, गंगोत्री की प्राकृतिक सुंदरता और यहाँ की सकारात्मक ऊर्जा आपको भीतर से बदल कर रख देगी। यह स्थान हमें यह भी याद दिलाता है कि प्रकृति और ईश्वर का संबंध कितना गहरा है और हमें अपनी नदियों को स्वच्छ और पवित्र बनाए रखने का संकल्प लेना चाहिए।














